चातुर्मास्य (भाद्र मास) स्तोत्र

  • श्रीगुर्वष्टकम्
  • श्रीप्रभुपाद-पद्म-स्तवकः
  • श्रीषड-गोस्वाम्यष्टकम्‌
  • श्रीगौर-गदाधराष्टकम्‌
  • श्रीचैतन्याष्टकम्‌
  • श्रीकुञ्जविहार्यष्टकम्
  • श्रीराधिकाष्टकम् (१)
  • श्रीगुर्वष्टकम्

    श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर

    संसार-दावानल-लीढ़-लोक
    त्राणाय कारुण्यघनाघनत्वम् ।
    प्राप्तस्य कल्याण-गुणार्णवस्य
    वन्दे गुरोः श्रीचरणारविन्दम् ॥१॥

    संसाररूपी-दावानलसे सन्तप्त लोगोंकी रक्षाके लिए जो करुणाके घने मेघस्वरूप होकर कृपावारि वर्षण करते हैं, मैं उन्हीं कल्याणगुणनिधि श्रीगुरुदेवके पादपद्मोंकी वन्दना करता हूँ।

    महाप्रभोः कीर्त्तन-नृत्य-गीत
    वादित्रमाद्यन्मनसो रसेन ।
    रोमाञ्च-कम्पाश्रु-तरङ्ग-भाजो
    वन्दे गुरोः श्रीचरणारविन्दम् ॥२॥

    सङ्कीर्त्तन, नृत्य, गीत तथा वाद्यादिके द्वारा उन्मत्तचित्त श्रीमन्महाप्रभुके प्रेमरसमें जिनके रोमाञ्च, कम्प और अश्रु तरङ्ग उद्गत होते हैं, मैं उन्हीं श्रीगुरुदेवके पादपद्मोंकी वन्दना करता हूँ।

    श्रीविग्रहाराधन-नित्य नाना
    शृङ्गार तन्मन्दिर-मार्ज्जनादौ ।
    युक्तस्य भक्तांश्च नियुञ्जतोऽपि
    वन्दे गुरोः श्रीचरणारविन्दम् ॥३॥

    जो श्रीभगवद्विग्रहकी नित्य-सेवा, शृङ्गाररसोद्दीपक तरह-तरहकी वेश रचना और श्रीमन्दिरके मार्जन आदि सेवाओंमें स्वयं नियुक्त रहते हैं तथा (अनुगत) भक्तजनको नियुक्त करते हैं, मैं उन्हीं श्रीगुरुदेवके पादपद्मोंकी वन्दना करता हूँ।

    चतुर्विध-श्रीभगवत्प्रसाद
    स्वाद्वन्नतृप्तान् हरिभक्तसङ्घान् ।
    कृत्वैव तृप्तिं भजतः सदैव
    वन्दे गुरोः श्रीचरणारविन्दम् ॥४॥

    जो श्रीकृष्णभक्त-वृन्दको चर्व्य, चुष्य, लेह्य और पेय-इन चतुर्विध रस-समन्वित सुस्वादु महाप्रसादान्न द्वारा परितृप्त कर (अर्थात् प्रसाद-सेवनके द्वारा प्रपञ्चनाश और प्रेमानन्दका उदय करवाकर) स्वयं तृप्ति लाभ करते हैं, उन्हीं श्रीगुरुदेवके पादपद्मोंकी मैं वन्दना करता हूँ।

    श्रीराधिका-माधवयोरपार
    माधुर्य्य-लीला-गुण-रूप-नाम्नाम् ।
    प्रतिक्षणास्वादन लोलुपस्य
    वन्दे गुरोः श्रीचरणारविन्दम् ॥५॥

    जो राधामाधवके अनन्त माधुर्यमय नाम, रूप, गुण और लीला समूहका आस्वादन करनेके लिए सर्वदा लुब्धचित्त हैं, उन्हीं श्रीगुरुदेवके पादपद्मोंकी मैं वन्दना करता हूँ।

    निकुञ्जयूनो रतिकेलिसिद्धै
    यां यालिभिर्युक्तिरपेक्षणीया ।
    तत्रातिदाक्ष्यादतिवल्लभस्य
    वन्दे गुरोः श्रीचरणारविन्दम् ॥६॥

    निकुञ्ज बिहारी 'ब्रज-युव-द्वन्द्व' के रतिक्रीड़ा-साधनके निमित्त सखियाँ जिन युक्तियोंका अवलम्बन करती हैं, उस विषयमें अति निपुण होनेके कारण जो उनके अतिशय प्रिय हैं, उन्हीं श्रीगुरुदेवके पादपद्मोंकी मैं वन्दना करता हूँ।

    साक्षाद्धरित्वेन समस्तशास्त्रै
    रुक्तस्तथा भाव्यत एव सद्भिः ।
    किन्तु प्रभोर्यः प्रिय एव तस्य
    वन्दे गुरोः श्रीचरणारविन्दम् ॥७॥

    निखिल शास्त्रोंने जिनका साक्षात् हरिके अभिन्न-विग्रहरूपसे गान किया है एवं साधुजन भी जिनकी उसी प्रकारसे चिन्ता किया करते हैं, तथापि जो प्रभु भगवानके एकान्त प्रिय हैं, उन्हीं (भगवान्के अचिन्त्य-भेदाभेद-प्रकाश-विग्रह) श्रीगुरुदेवके पादपद्मोंकी मैं वन्दना करता हूँ।

    यस्य प्रसादाद्भगवत्प्रसादोः
    यस्याप्रसादान्न गतिः कुतोऽपि ।
    ध्यायंस्तुवंस्तस्य यशस्त्रिसन्ध्यं
    वन्दे गुरोः श्रीचरणारविन्दम् ॥८॥

    एकमात्र जिनकी कृपा द्वारा ही भगवद्-अनुग्रह लाभ होता है, जिनके अप्रसन्न होनेसे जीवोंका कहीं भी निस्तार नहीं है, मैं त्रिसन्ध्या उन्हीं श्रीगुरुदेवकी कीर्ति्त समूहका स्तव और ध्यान करते-करते उनके पादपद्मोंकी वन्दना करता हूँ।

    श्रीमद्गुरोरष्टकमेतदुच्चै-
    र्ब्राह्मे मुहूर्त्ते पठति प्रयत्नात् ।
    यस्तेन वृन्दावन-नाथ साक्षात्
    सेवैव लभ्या जनुषोऽन्त एव ॥९॥

    जो व्यक्ति इस गुरुदेवाष्टकका ब्राह्म मुहूर्त्तमें (अरुणोदयसे चार दण्ड पहले) अतिशय यत्नके साथ उच्चस्वरसे पाठ करते हैं, वे वस्तु-सिद्धिके समय वृन्दावनचन्द्रका सेवाधिकार प्राप्त करते हैं।


    श्रीप्रभुपादपद्म-स्तवकः

    श्रील भक्तिरक्षक-श्रीधर गोस्वामी महाराज-विरचितम्‌

    सुजनार्बुदराधितपादयुगं
    युगधर्मधुरन्धर पात्रवरम् ।
    वरदाभयदायक-पूज्यपदं
    प्रणमामि सदा प्रभुपादम् ॥१॥

    मैं कोटि-कोटि सज्जनोंके द्वारा आराधित, कृष्ण सङ्कीर्त्तन युग-धर्मके संस्थापक, विश्ववैष्णव राजसभाके पात्रराज अर्थात् अधिकारीवर्गमें श्रेष्ठतम, निखिल जीवोंके भय दूर करनेवालोंकी भी मनोकामना पूर्ण करनेवाले, सर्वपूज्य उन श्रील प्रभुपादके श्रीचरणकमलोंमें सदा-सर्वदा प्रणाम करता हूँ।

    भजनोर्जितसज्जनसङ्घपतिं
    पतिताधिककारुणिकैकगतिम् ।
    गतिवञ्चितवञ्चकाचिन्त्यपदं
    प्रणमामि सदा प्रभुपादपदम् ॥२॥

    जो भजन-सम्पन्न सज्जन-वृन्दोंके अधिपति हैं, जो पतितजनोंके प्रति अति करुणामय तथा उनकी एकमात्र गति हैं एवं जो वञ्चकोंके भी वञ्चक हैं, मैं उन श्रीलप्रभुपादके अचिन्त्य चरणकमलोंमें सदा-सर्वदा प्रणाम करता हूँ।

    अतिकोमलकाञ्चनदीर्घतनुं
    तनुनिन्दितहेममृणालमदम् ।
    मदनार्बुदवन्दितचन्द्रपदं
    प्रणमामि सदा प्रभुपादपदम् ॥३॥

    अतिकोमल काञ्चनवर्णवाले सुदीर्घ तनु जिसके द्वारा स्वर्णमय कमलनालोंकी मत्तता (सौन्दर्य) भी निन्दित होती है, जिन नख-चन्द्रोंकी वन्दना कोटि-कोटि कामदेव करते हैं, मैं उन श्रीलप्रभुपादके चरणकमलोंमें सदा-सर्वदा प्रणाम करता हूँ।

    निजसेवकतारकरञ्जिविधुं
    विधूताहितहुङ्कृतसिंहवरम् ।
    वरणागतबालिश-शन्दपदं
    प्रणमामि सदा प्रभुपादपदम् ॥४॥

    जो नक्षत्र-मण्डलको रंजित करनेवाले चन्द्रकी तरह सेवक-मण्डली द्वारा परिवेष्टित होकर उनके चित्तको प्रफुल्लित रखते हैं, भक्तिविद्वेषिजन जिनके सिंहनादसे भयभीत रहते हैं एवं निरीह व्यक्ति जिनके चरणकमलोंका आश्रय ग्रहणकर परम कल्याण लाभ करते हैं, मैं उन श्रीलप्रभुपादके चरणकमलोंमें सदा-सर्वदा प्रणाम करता हूँ।

    विपुलीकृतवैभवगौरभुवं
    भुवनेषु विकीर्ति्तत गौरदयम् ।
    दयनीयगणार्पित-गौरपदं
    प्रणमामि सदा प्रभुपादपदम् ॥५॥

    जिन्होंने श्रीगौरधामका (श्रीनवद्वीपधामका) विपुल ऐश्वर्य प्रकटित किया है, जिन्होंने श्रीगौराङ्गदेवकी महोदारताकी कथाओंका सम्पूर्ण विश्वमें प्रचार किया है एवं जिन्होंने अपने कृपापात्रोंके हृदयमें श्रीगौरपादपद्मकी स्थापना की है, मैं उन श्रीलप्रभुपादके चरणकमलोंमें सदा-सर्वदा प्रणाम करता हूँ।

    चिरगौरजनाश्रयविश्वगुरुं
    गुरु-गौरकिशोरक-दास्यपरम् ।
    परमादृतभक्तिविनोदपदं
    प्रणमामि सदा प्रभुपादपदम् ॥६॥

    जो चैतन्यमहाप्रभुके आश्रितजनोंके नित्य आश्रयस्थल और जगद्गुरु हैं, जो अपने गुरु श्रीगौरकिशोरके सेवापरायण हैं एवं जो श्रीभक्तिविनोद ठाकुरके सम्बन्धमात्रसे ही परम आदरयुक्त हैं, मैं उन श्रीलप्रभुपादके चरणकमलोंमें सदा-सर्वदा प्रणाम करता हूँ।

    रघुरूपसनातनकीर्ति्तधरं
    धरणीतलकीर्ति्ततजीवकविम् ।
    कविराज नरोत्तमसख्यपदमं
    प्रणमामि सदा प्रभुपादपदम् ॥७॥

    जो श्रीरूप, सनातन और रघुनाथके कीर्ति्तरूपी झण्डेका उत्तोलनकर विराजमान हैं, अनेक लोग इस धरणीतलपर जिन्हें पाण्डित्य-प्रतिभामय जीव गोस्वामीसे अभिन्न तनु कहकर उनकी प्रशंसा किया करते हैं एवं जिनका श्रीलकृष्णदास कविराज तथा ठाकुर नरोत्तमसे सख्यभाव है, मैं उन श्रीलप्रभुपादके चरणकमलोंमें सदा-सर्वदा प्रणाम करता हूँ।

    कृपया हरिकीर्त्तनमूर्ति्तधरं
    धरणीभरहारक-गौरजनम् ।
    जनकाधिकवत्सल स्निग्धपदं
    प्रणमामि सदा प्रभुपादपदम् ॥८॥

    जीवोंके प्रति असीम कृपाकर जो मूर्ति्तमान हरिकीर्त्तनरूपमें प्रकाशित हैं, जो धरणीके पापभारको दूर करनेवाले गौरपार्षद हैं एवं जो जीवोंके प्रति पितासे भी अधिक वात्सल्यके सुकोमल आकरस्वरूप हैं, मैं उन श्रीलप्रभुपादके चरणकमलोंमें सदा-सर्वदा प्रणाम करता हूँ।

    शरणागतकिङ्करकल्पतरुं
    तरुधिक्कृतधीरवदान्यवरम् ।
    वरदेन्द्रगणार्चितदिव्यपदं
    प्रणमामि सदा प्रभुपादपदम् ॥९॥

    शरणागत किङ्करोंके लिए (अभीष्ट प्रदान करनेमें) जो कल्पतरुके समान हैं, जिनकी सहिष्णुता और उदारता वृक्षोंको भी लज्जित करती हैं एवं वरदाताओंमें श्रेष्ठ व्यक्ति भी जिनके दिव्य श्रीचरणकमलोंकी पूजा किया करते हैं, मैं उन श्रीलप्रभुपादके चरणकमलोंमें सदा-सर्वदा प्रणाम करता हूँ।

    परहंसवरं परमार्थपतिं
    पतितोद्धरणे कृतवेशयतिम् ।
    यतिराजगणैः परिसेव्यपदं
    प्रणमामि सदा प्रभुपादम् ॥१०॥

    जो परमहंसकुलके चूड़ामणि हैं, जो परम पुरुषार्थ श्रीकृष्णपे्रम-सम्पत्तिके मालिक हैं, पतित जीवोंके उद्धारके लिए जिन्होंने संन्यासीका वेश धारण किया है एवं श्रेष्ठ त्रिदण्डि संन्यासियोंका समूह जिनके पादपद्मोंकी सेवा करता है, मैं उन श्रीलप्रभुपादके चरणकमलोंमें सदा-सर्वदा प्रणाम करता हूँ।

    वृषभानुसुतादयितानुचरं
    चरणाश्रित रेणुधरस्तमहम् ।
    महदद्भुतपावनशक्तिपदं
    प्रणमामि सदा प्रभुपादम् ॥११॥

    जो वृषभानुनन्दिनीके परमप्रिय अनुचर हैं, जिनकी चरण-रजको मैं अपने मस्तकपर धारण करनेके सौभाग्यके लिए अभिमान करता हूँ, उन अद्भुत पावनीशक्तिसम्पन्न श्रीलप्रभुपादके चरणकमलोंमें मैं सदा-सर्वदा प्रणाम करता हूँ।


    श्रीषड्‌गोस्वाम्यष्टकम्‌

    श्रील श्रीनिवासाचार्य विरचितम्‌

    कृष्णोत्कीर्तन-गान-नर्तन-परौ प्रेमामृताम्भोनिधी
    धीराधीरजन-प्रियौ  प्रियकरौ  निर्मत्सरौ पूजितौ ।
    श्रीचैतन्य-कृपाभरौ भुवि भुवो भारावहन्तारकौ
    वन्दे रूप-सनातनौ रघुयुगौ श्रीजीव-गोपालकौ ॥१॥

    मैं, श्रीरूप, सनातन, रघुनाथभट्ट, रघुनाथदास, श्रीजीव एवं गोपालभट्ट नामक इन छः गोस्वामियोंकी वन्दना करता हूँ कि, जो श्रीकृष्णके नाम-रूप-गुण-लीलाओंके कीर्तन, गायन एवं नृत्यपरायण थे; प्रेमामृतके समुद्रस्वरूप थे, विद्वान् एवं अविद्वान्रूप सर्वसाधारण जनमात्रके प्रिय थे तथा सभीके प्रियकार्योंको करनेवाले थे, मात्सर्यरहित एवं सर्वलोक पूजित थे, श्रीचैतन्यदेवकी अतिशय कृपासे युक्त थे, भूतलमें भक्तिका विस्तार करके भूमिका भार उतारनेवाले थे।

    नानाशास्त्र-विचारणैक-निपुणौ सद्धर्म-संस्थापकौ
    लोकानां हितकारिणौ त्रिभुवने मान्यौ शरण्याकरौ ।
    राधाकृष्ण-पदारविन्द-भजनानन्देन मत्तालिकौ
    वन्दे रूप-सनातनौ रघुयुगौ श्रीजीव-गोपालकौ ॥२॥

    मैं, श्रीरूप-सनातनादि उन छः गोस्वामियोंकी वन्दना करता हूँ कि, जो अनेक शास्त्रोंके गूढ़तात्पर्य विचार करनेमें परमनिपुण थे, भक्तिरूप-परमधर्मके संस्थापक थे, जनमात्रके परमहितैषी थे, तीनों लोकोंमें माननीय थे, शरणागतवत्सल थे एवं श्रीराधाकृष्णके पदारविन्दके भजनरूप आनन्दसे मत्तमधुपके समान थे।

    श्रीगौरांग-गुणानुवर्णन-विधौ श्रद्धा-समृद्धय्न्वितौ
    पापोत्ताप-निकृन्तनौ तनुभृतां गोविन्द-गानामृतैः ।
    आनन्दाम्बुधि-वर्धनैक-निपुणौ कैवल्य-निस्तारकौ
    वन्दे रूप-सनातनौ रघुयुगौ श्रीजीव-गोपालकौ ॥३॥

    मैं, श्रीरूप-सनातनादि उन छः गोस्वामियोंकी वन्दना करता हूँ कि, जो श्रीगौराङ्गदेवके गुणानुवादकी विधिमें श्रद्धारूप-सम्पत्तिसे युक्त थे, श्रीकृष्णके गुणगानरूप-अमृतकी वृष्टिके द्वारा प्राणीमात्रके पाप-तापको दूर करनेवाले थे तथा आनन्दरूप-समुद्रको बढ़ानेमें परमकुशल थे, भक्तिका रहस्य समझाकर, मुक्तिकी भी मुक्ति करनेवाले थे।

    त्यक्त्वा तूर्णमशेष-मण्डलपति-श्रेणीं सदा तुच्छवत्
    भूत्वा दीनगणेशकौ करुणया कौपीन-कन्थाश्रितौ ।
    गोपीभाव-रसामृताब्धि-लहरी-कल्लोल-मग्नौ मुहु-
    र्वन्दे रूप-सनातनौ रघुयुगौ श्रीजीव-गोपालकौ ॥४॥

    मैं, श्रीरूप-सनातनादि उन छः गोस्वामियोंकी वन्दना करता हूँ कि, जो समस्त मण्डलोंके आधिपत्यकी श्रेणीको, लोकोत्तर वैराग्यसे शीघ्र ही तुच्छकी तरह सदाके लिए छोड़कर, कृपापूर्वक अतिशय दीन होकर, कौपीन एवं कंथा (गूदड़ी) को धारण करनेवाले थे तथा गोपीभावरूप रसामृतसागरकी तरंगोंमें आनन्दपूर्वक निमग्न रहते थे।

    कूजत्-कोकिल-हंस-सारस-गणाकीर्णे मयूराकुले
    नानारत्न-निबद्ध-मूल-विटप-श्रीयुक्त-वृन्दावने ।
    राधाकृष्णमहर्निशं प्रभजतौ जीवार्थदौ यौ मुदा
    वन्दे रूप-सनातनौ रघुयुगौ श्रीजीव-गोपालकौ ॥५॥

    मैं, श्रीरूप-सनातनादि उन छः गोस्वामियोंकी वन्दना करता हूँ कि, जो कलरव करनेवाले कोकिल-हंस-सारस आदि पक्षिओंकी श्रेणीसे व्याप्त एवं मयूरोंके केकारवसे आकुल, तथा अनेक प्रकारके रत्नोंसे निबद्ध मूलवाले वृक्षोंके द्वारा शोभायमान श्रीवृन्दावनमें, रातदिन श्रीराधाकृष्णका भजन करते रहते थे तथा जीवमात्रके लिए हर्षपूर्वक भक्तिरूप परमपुरुषार्थ देनेवाले थे।

    संख्यापूर्वक-नामगाननतिभिः कालावसानीकृतौ
    निद्राहार-विहारकादि-विजितौ चात्यन्त-दीनौ च यौ ।
    राधाकृष्ण-गुणस्मृतेर्मधुरिमानन्देन सम्मोहितौ
    वन्दे रूप-सनातनौ रघुयुगौ श्रीजीव-गोपालकौ ॥६॥

    मैं, श्रीरूप-सनातनादि उन छः गोस्वामियोंकी वन्दना करता हूँ कि, जो अपने समयको संख्यापूर्वक नाम-जप, नामसंकीर्तन एवं संख्यापूर्वक प्रणाम आदिके द्वारा व्यतीत करते थे; जिन्होंने निद्रा-आहार-विहार आदिपर विजय प्राप्तकरली थी एवं जो अपनेको अत्यन्त दीन मानते थे तथा श्रीराधाकृष्णके गुणोंकी स्मृतिसे प्राप्त माधुर्यमय आनन्दके द्वारा विमुग्ध रहते थे।

    राधाकुण्ड-तटे कलिन्द-तनया-तीरे च वंशीवटे
    प्रेमोन्माद-वशादशेष-दशया ग्रस्तौ प्रमत्तौ सदा ।
    गायन्तौ च कदा हरेर्गुणवरं भावाभिभूतौ मुदा
    वन्दे रूप-सनातनौ रघुयुगौ श्रीजीव-गोपालकौ ॥७॥

    मैं, श्रीरूप-सनातनादि उन छः गोस्वामियोंकी वन्दना करता हूँ कि, जो प्रेमोन्मादके वशीभूत होकर, विरहकी समस्त दशाओंके द्वारा ग्रस्त होकर, प्रमादीकी भाँति, कभी राधाकुण्डके तटपर, कभी युमनाके तटपर एवं कभी वंशीवटपर सदैव घूमते रहते थे; और कभी-कभी श्रीहरिके गुणश्रेष्ठोंको हर्षपूर्वक गाते हुए भावमें विभोर रहते थे।

    हे राधे! व्रजदेविके! च ललिते! हे नन्दसूनो! कुतः
    श्रीगोवर्धन-कल्पपादप-तले कालिन्दिवन्ये कुतः ।
    घोषन्ताविति  सर्वतो  व्रजपुरे  खेदैर्महाविह्वलौ
    वन्दे रूप-सनातनौ रघुयुगौ श्रीजीव-गोपालकौ ॥८॥

    मैं, श्रीरूप-सनातनादि उन छः गोस्वामियोंकी वन्दना करता हूँ कि, जो "हे व्रजकी पूजनीय देवि! राधिके! आप कहाँ हो? हे ललिते! आप कहाँ हो? हे व्रजराजकुमार! आप कहाँ हो? श्रीगोवर्धनके कल्पवृक्षोंके नीचे बैठे हो अथवा कालिन्दीके कमनीय कूलपर विराजमान वन समूहमें भ्रमण कर रहे हो क्या?" इस प्रकार पुकारते हुए विरहजनित पीड़ाओंसे महान विह्वल होकर, व्रजमण्डलमें चारों ओर भ्रमण करते थे।


    श्रीगौर-गदाधराष्टकम्‌

    श्रीमद्‌ अच्युतानन्द गोस्वामी

    क्षितौ लुठद्‌गौर-कलेवराभ्यां
    सदा महाप्रेमविलासकाभ्याम् ।
    समुद्रतीरे नटनागराभ्यां
    नमोऽस्तु मे गौरगदाधराभ्याम् ॥१॥

    जो गौर कलेवरद्वय सदैव महाप्रेमविलासमें भूमिपर लुण्ठित होते थे, समुद्रतटपर श्रीपुरुषोत्तम धाममें श्रीकृष्ण-कीर्तन-गान-नर्तन रत जो व्रजके नागर-नागरी हैं, उन श्रीगौर-गदाधर प्रभुको मेरा अनन्त नमस्कार है॥१॥

    हाहा कृ राधेति मुहुः स्थिताभ्यां
    श्रीराधिकाकृष्णवपुर्धराभ्याम् ।
    आनन्दलीलारसरञ्जिताभ्यां
    नमोऽस्तु मे गौरगदाधराभ्याम् ॥२॥

    जो आनन्दघन-लीलारससे रञ्जित हैं, ‘हा राधे हा कृष्ण, आपलोग कहाँ हैं?’—ऐसा कहकर जो पुनः पुनः अत्यन्त भावाविष्ट होते थे, उन श्रीराधाकृष्ण विग्रहोंसे अभिन्न श्रीगौर-गदाधर प्रभुद्वयको मेरा अशेष प्रणाम है॥२॥

    अद्वैतचिन्ताहरसम्भवाभ्यां
    सदा भवानन्दमनोहराभ्याम् ।
    अचिन्त्यलीलापरिपूरिताभ्यां
    नमोऽस्तु मे गौरगदाधराभ्याम् ॥३॥

    ‘कलिहत जीवोंका किस प्रकार उद्धार होगा’— श्रील अद्वैताचार्य प्रभुकी ऐसी दुश्चिन्ताको हरण करनेके लिए जो आविर्भूत हुए, सर्वदा प्रेमानन्दमय, मनोहर, अचिन्त्य-लीला परिपूरणकारी श्रीश्रीगौर- गदाधर प्रभुद्वयको मेरी असंख्य प्रणति है॥३॥

    जीवैकनिस्तारधृतव्रताभ्यां
    श्रीकृष्णनाम्नाजनतारकाभ्याम् ।
    हरे हरे कृष्ण मुखाम्बुजाभ्यां
    नमोऽस्तु मे गौरगदाधराभ्याम् ॥४॥

    जीवोद्धार-व्रतावलम्बी जो श्रीकृष्ण-नाम द्वारा कृष्णविमुख लोगोंके तारणमें रत हैं, श्रीमुखकमलमें सदैव ‘हरे कृष्ण’—महामन्त्र संकीर्तनरत हैं, उन श्रीश्रीगौर-गदाधर प्रभुद्वयके श्रीचरणकमलोंमें मेरा नमस्कार है॥४॥

    अशेषदुःखामयभेषजाभ्यां
    किरीटकेयूरविभूषिताभ्याम् ।
    ग्रैवेयमालामणिरञ्जिताभ्यां
    नमोऽस्तु मे गौरगदाधराभ्याम् ॥५॥

    जो अशेष भव-यन्त्रणाओंके सुचिकित्सक हैं, किरीट-केयूरसे विभूषित हैं और जिनका गला मणिजडि़त मालासे शोभित है, ऐसे श्रीश्रीगौर-गदाधर प्रभुद्वयके पदारविन्दोंमें मेरा अनन्त प्रणाम है॥५॥

    श्रीवत्सरोमावलिरञ्जिताभ्यां
    वक्षःस्थले कौस्तुभभूषिताभ्याम् ।
    त्रैलोक्यसम्मोहनसुन्दराभ्यां
    नमोऽस्तु मे गौरगदाधराभ्याम् ॥६॥

    रोमावलीकी शोभासे युक्त जिनके वक्षःस्थल पर कौस्तुभ मणि शोभित हैं, जिनका सौन्दर्य त्रिलोकको सम्मोहित करनेवाला है, ऐसे श्रीश्रीगौर-गदाधर प्रभुद्वयके श्रीचरणोंमें मेरी प्रणति है॥६॥

    स्फुरच्चलत्काञ्चनकुण्डलाभ्यां
    सदाष्टभावैः परिशोभिताभ्याम् ।
    स्वेदाश्रुकम्पादिविभूषिताभ्यां
    नमोऽस्तु मे गौरगदाधराभ्याम् ॥७॥

    जो दीप्यमान चञ्चल स्वर्णकुण्डलसे सुशोभित हैं, स्वेद-अश्रु-कम्प आदि अष्ट-सात्त्विक भावोंसे परिशोभित हैं, उन श्रीश्रीगौर-गदाधर प्रभुद्वयके श्रीपदकमलोंमें मेरा पुनः पुनः प्रणाम है॥७॥

    श्रीमच्छिवानन्दमनोरथाभ्यां
    सदा सुखानन्दरसस्फुराभ्याम् ।
    मदीयसर्वस्वपदाम्बुजाभ्यां
    नमोऽस्तु मे गौरगदाधराभ्याम् ॥८॥

    जिनके चरणकमलयुगल श्रीशिवानन्द प्रभुके मनोरथ पर अधिष्ठित, सदैव चित्सुखानन्द-रससे देदीप्यमान और मेरे प्राणसर्वस्व हैं, उन श्रीश्रीगौर- गदाधर प्रभुद्वयके पादपद्मोंमें मेरी असंख्य दण्डवन्नति है॥८॥

    पठन्ति ये गौरगदाधराष्टकं
    पद्यं लभन्ते व्रजयुग्मपादम् ।
    अद्वैतपुत्रेण मयोक्तमेत-
    न्नाम्नाच्युतानन्दजनेन धीमता ॥९॥

    श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र श्रीअच्युतानन्दके द्वारा रचित इस गौर-गदाधर अष्टकको जो पाठ करते हैं, वे व्रजयुवद्वन्द्वके चरणकमलोंको प्राप्त करते हैं॥९॥

    (श्रीभागवात-पत्रिका २.११)


    श्रीचैतन्याष्टकम्‌

    श्रील रूप गोस्वामी

    सदोपास्यः श्रीमान् धृत-मनुज-कायैः प्रणयितां
    वहद्भिर्गीर्वाणैर्गिरिश-परमेष्ठिप्रभृतिभिः।
    स्वभक्तेभ्यः शुद्धां निज-भजन-मुद्रामुपदिशन्
    स चैतन्यः किं मे पुनरपि दृशोर्यास्यति पदम्॥१॥

    श्रीवृन्दावनमें विद्यमान श्रीरूप गोस्वामी, श्रीपुरुषोत्तमक्षेत्रमें विराजमान श्रीचैतन्यमहाप्रभुको "कृष्णवर्णं" इत्यादि भा- ११/५/३२ शास्त्रके द्वारा एवं उन्हीं (श्रीचैतन्यदेव) के अनुग्रहके द्वारा उनको साक्षात् भगवद् रूपसे अनुभवमें लाकर, तत्त्वरूपसे वर्णन करते हुए, उनके दर्शनकी आकांक्षासे, विरहविह्वल होकर कहते हैं कि—
    वे श्रीचैतन्यमहाप्रभु फिर भी मेरे नेत्रगोचर होंगे क्या? जो कि मनुष्यका शरीर धारण करनेवाले एवं अपनेमें प्रेमधारण करनेवाले शिव, ब्रह्मा आदि देवताओंके द्वारा सदैव उपासनीय हैं एवं परमशोभायमान हैं; तथा श्रीस्वरूपदामोदर आदि अपने भक्तोंके लिए अपने भजनकी विशुद्ध मुद्रा (कर्मयोगादिसे अनावृत अपने भजनकी परिपाटी) का उपदेश देते हुए विराजमान हैं। यदि कहो कि, उनके निकट तो ब्रह्मा आदि देवता सेवा करते हुए नहीं दिखाई देते हैं। इसके उत्तरमें कहते हैं कि, श्रीकृष्णावतारमें तो ब्रह्मादि देवता उनकी साक्षात्रूपसे उपासना करते थे; किन्तु इस अवतारमें तो शंकर, श्रीअद्वैताचार्यके रूपसे एवं ब्रह्मा, नामाचार्य श्रीहरिदासके रूपसे उपासना करते हैं।
    तात्पर्य—"कृष्णवर्णं त्विषाकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम्। यज्ञैः संकीर्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः॥" भा- ११/५/३२ इस श्लोकमें जो चतुर्थ युगावतार वर्णित है, वह श्रीकृष्णचैतन्य-महाप्रभुरूप ही है; क्योंकि श्रीहरिनाम-संकीर्तनप्रधान यज्ञका असाधारण धर्म, उन्ही में देखा जाता है। और असाधारण धर्मवाले लक्षणके द्वारा ही लक्ष्यका परिचय होता है। जैसे "जन्माद्यस्य यतः" इस ब्रह्मसूत्रमें जगत् जन्मादिके कारण होनेके नाते, उसका लक्ष्य ब्रह्म परिचित होता है, उसी प्रकार श्रीचैतन्यावतार भी, मनुष्य रूपधारी देवताओंके द्वारा सेवनीय है। बारम्बार प्रकट न होनेवाले इस अवतारको "महान् प्रभुर्वै पुरुषः सत्त्वस्यैष प्रवर्तकः" यह श्रुति भी प्रकाशित करती है। इस प्रकार साक्षात् ईश्वर रूपसे विनिश्चित श्रीचैतन्यदेवमें, यदि किसी मन्दमतिकी आस्था नहीं दिखाई देती है, तो उस मन्दमतिके ऊपर उन (श्रीचैतन्यदेव) की कृपाका अभाव ही जानना चाहिए; क्योंकि "यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः", "तमक्रतुः पश्यति वीतशोकं धातुः प्रसादान्महिमानमीशम्" इत्यादि श्रुतियों तथा "अथापि ते देव! पदांबुजद्वयप्रसादलेशानुगृहीत एव हि। जानाति तत्त्वं भगवन् महिम्नो न चान्य एकोऽपि चिरं विचिन्वन्॥" भा- १०/१४/२६ इत्यादि स्मृतियोंसे, उनकी कृपा ही उनके दर्शनमें हेतु है। यह भाव अन्वय-व्यतिरेकके द्वारा श्रीवासुदेवसार्वभौम भट्टाचार्य आदि महानुभावोंके ऊपर स्पष्ट ही देखा गया है, हाय! ऐसा मेरा भी सौभाग्यपट कब खुलेगा?॥१॥

    सुरेशानां दुर्गं गतिरतिशयेनोपनिषदां
    मुनीनां सर्वस्वं प्रणतपटलीनां मधुरिमा।
    विनिर्यासः प्रेम्णो निखिल-पशुपालाम्बुज-दृशां
    स चैतन्यः किं मे पुनरपि दृशोर्यास्यति पदम्॥२॥

    ये श्रीचैतन्यदेव, श्रीकृष्णके अंशावताररूप चतुर्थ युगके अवतारस्वरूप नहीं हैं; क्योंकि "कृते शुक्लो धर्ममूर्ती रक्तस्त्रेतायुगे मतः। द्वापरे च कलौ चापि श्यामलाङ्गः प्रकीर्तितः॥" इस स्मृति प्रमाणसे, वह चतुर्थ युगावतार तो श्यामवर्णवाला कहा गया है; किन्तु यह अवतार तो निजप्रेयसी श्रीमती राधिकाके भाव एवं कान्तिके द्वारा, अपनी कान्तिको छिपाकर स्वयं श्रीगौररूपमें ही प्रकट हुआ है। इस भावको प्रदर्शित करते हुए श्रीरूप गोस्वामी दूसरे श्लोकमें कहते हैं कि—
    वे श्रीचैतन्यमहाप्रभु फिर भी मेरे नेत्रोंके सामने पदार्पण करेंगे क्या? जो ब्रह्मादि देवताओंके लिए भी "दुर्ग" अर्थात् निर्भयस्थान स्वरूप हैं, एवं उपनिषदोंके लिए भी "अतिशयगति" अर्थात् परमतत्त्व संचारस्वरूप अथवा प्राप्यस्वरूप हैं, एवं जो मुनियोंके दोनों लोकोंके धनस्वरूप हैं, एवं दासभक्तवृन्दोंके दास्यभक्तिके माधुर्यरूप हैं, तथा समस्त व्रजाङ्गनाओंके श्रीकृष्णविषयक प्रेमके "विनिर्यासः" अर्थात् सारस्वरूप हैं॥२॥

    स्वरूपं बिभ्राणो जगदतुलमद्वैत-दयितः
    प्रपन्न-श्रीवासो जनित-परमानन्द-गरिमा।
    हरिर्दीनोद्धारी गजपति-कृपेोत्सेक-तरलः
    स चैतन्यः किं मे पुनरपि दृशोर्यास्यति पदम्॥३॥

    अब तीसरे श्लोकमें श्लेषालंकारके द्वारा साक्षात् कृष्ण रूपसे वर्णन करते हुए कहते हैं कि—
    वे श्रीचैतन्यमहाप्रभु फिर भी मेरे दृष्टिगोचर होंगे क्या? जो संसारमें अनुपम एवं स्वरूप, अर्थात् श्रीजीव गोस्वामीके पितृपाद तथा स्वरूपदामोदर-नामक अपने प्रियपार्षदको, अपनी कृपासुधासे परिपुष्ट करते रहते हैं अद्वैताचार्यके परमप्रिय हैं श्रीवास-नामक पंडित जिनके शरणागत हो गए हैं एवं परमानन्दपुरी-नामक अपने काका-गुरुमें जिनका गुरुभाव है एवं सांसारिक अविद्याका अपहरण करनेके कारण जो 'हरि' कहलाते हैं, तथा जो त्रिविध ताप संतप्त दीनदुःखी जीवोंका उद्धार करनेवाले हैं और जो उत्कलदेशके अधिपति गजपति (प्रतापरुद्र)-नामक नृपतिके ऊपर कृपामयी धारासे, अभिषेक करनेके लिए चंचल हो रहे हैं। श्लेषपक्षे—"हरिः, अर्थात् सिंह होकर भी गजराजके ऊपर कृपाभिषेक करनेमें चञ्चल हैं" यहाँपर विरोधाभास-अलंकार है। इससे अद्भुत सिंहत्व व्यंजित होता है। कृष्णपक्षमें यह अर्थ है कि, सच्चिदानन्द-विग्रहवाले वे श्रीकृष्ण फिर भी मेरे दृष्टिगोचर होंगे क्या? जो संसारमें "न तस्य प्रतिमास्ति" इत्यादि श्रुतिके अनुसार अपने अतुल स्वरूपको, अर्थात् श्रीविग्रहको धारण करते हुए "एकोऽपि सन् बहुधा यो विभाति एकं सन्तं बहुधा दृश्यमानम्" इत्यादि श्रुतिके अनुसार अनेक रूपवाले होकर भी, जिनको अपना अद्वितीय श्रीकृष्ण रूप ही प्रिय है, तात्पर्य जो एकताको न त्यागकर, अनेक रूप धारण करनेवाले हैं एवं जो "प्रपन्नायाः पादसेविन्याः श्रियो लक्ष्म्या निवासः समाश्रयः" अर्थात् जो अपनी शरणमें आई हुई, चरणसेविका लक्ष्मीदेवीके निवासस्वरूप हैं एवं "जनितः स्वजन्मना प्रादुर्भावितः परमानन्दगरिमा निःसीमातिशयः सुखराशिर्येन सः" अर्थात् जिन्होंने अपने प्रादुर्भावके द्वारा, असीम अतिशय सुखसमूह प्रकट कर दिया है तथा जो भक्तोंके पापापहारी होनेसे 'हरि' हैं, दीनजनोंका उद्धार करनेवाले हैं तथा गजपति अर्थात् ग्राहसे ग्रस्त, गजेन्द्रके ऊपर कृपामयी दृष्टिकी सृष्टि करनेमें परम उतावले हो रहे हैं। इस श्लोकमें शब्दार्थश्लेषका सम्मेलन है॥३॥

    रसोद्दामा कामार्बुद-मधुर-धामोज्ज्वल-तनु-
    र्यतीनामुत्तंसस्तरणि-कर-विद्योति-वसनः।
    हिरण्यानां  लक्ष्मीभरमभिभवन्नाङ्गिक-रुचा
    स चैतन्यः किं मे पुनरपि दृशोर्यास्यति पदम्॥४॥

    वे श्रीचैतन्यमहाप्रभु मेरे नेत्रोंके सामने फिर भी पधारेंगे क्या? जोकि भक्तिके परम मधुर रसोंके आस्वादनजन्य सुखोंसे उन्मत्त रहते हैं, एवं जिनका श्रीविग्रह करोड़ों कामदेवोंसे भी मधुर मनोहर तेजसे परमोज्ज्वल है अर्थात् जो अतिमोहन मूर्तिवाले हैं; एवं जो संन्यासियोंके मुकुटमणि हैं एवं जिनके वस्त्र प्रातःकालीन सूर्यकी
    हरे कृष्णेत्युच्चैः स्फुरित-रसनो नामगणना-किरणोंके समान अरुणवर्णवाले हैं, तथा जो अपने श्रीविग्रहकी कान्तिके द्वारा सुवर्णसमुदायकी अतिशय शोभाका तिरस्कार करते हुए विराजमान हैं॥४॥

    हरे कृष्णेत्युच्चैः स्फुरित-रसनो नाम-गणना-
    कृत-ग्रन्थिश्रेणी-सुभग-कटिसूत्रोज्ज्वल-करः।
    विशालाक्षो दीर्घार्गल-युगल-खेलाञ्चित-भुजः
    स चैतन्यः किं मे पुनरपि दृशोर्यास्यति पदम्॥५॥

    वे श्रीचैतन्यमहाप्रभु मुझे फिर भी दर्शन देंगे क्या? जिनकी जिह्वा "हरे कृष्ण" इत्यादि महामन्त्रके उच्चस्वरसे उच्चारणके द्वारा नृत्य करती रहती है अथवा जिनकी जिह्वारूपी रङ्गस्थलीपर "हरे कृष्ण" इत्यादि महामन्त्र सर्वोत्तमभावसे नटकी तरह, स्वयं नृत्य करता रहता है जिनका वामहस्त, उच्चारित किए हुए नामोंकी गिनतीके लिए की हुई ग्रन्थिश्रेणीसे, सुन्दर कटिसूत्रके द्वारा सुशोभित हैं जिनके दोनों नेत्र कर्णपर्यन्त विशाल हैं एवं जिनकी दोनों भुजाएँ जानुपर्यन्त लंबी हैं॥५॥

    पयोराशेस्तीरे  स्फुरदुपवनाली-कलनया
    मुहुर्वृन्दारण्य-स्मरण-जनित-प्रेम-विवशः।
    क्वचित् कृष्णावृत्ति-प्रचल-रसनो-भक्ति-रसिकः
    स चैतन्यः किं मे पुनरपि दृशोर्यास्यति पदम्॥६॥

    वे श्रीचैतन्यमहाप्रभु फिर भी मेरे दृष्टिगोचर होंगे क्या? जो कि श्रीजगन्नाथपुरीके निकटवर्ती समुद्रके तीरपर, स्फूर्ति पानेवाली उपवनश्रेणीको देखकर, बारंबार वृन्दावनके स्मरणजनित प्रेमके अधीन बने रहते हैं एवं जिनकी जिह्वा किसी स्थानपर, श्रीकृष्णके नामोंकी आवृत्तिसे प्रतिक्षण चलती रहती है; क्योंकि वे प्रेमलक्षणाभक्तिके परमरसिक हैं॥६॥

    रथारूढस्यारादधिपदवि  नीलाचल-पते -
    रदभ्र-प्रेमोर्मि-स्फुरित-नटनोल्लास-विवशः।
    सहर्षं गायद्भिः परिवृत-तनुर्वैष्णव-जनैः
    स चैतन्यः किं मे पुनरपि दृशोर्यास्यति पदम्॥७॥

    वे श्रीचैतन्यमहाप्रभु मेरे नेत्रोंके सामने फिर भी पधारेंगे क्या? जो कि रथमें विराजमान श्रीजगन्नाथदेवके निकटवर्ती मार्गमें, अतिशय प्रेमकी तरङ्गोंसे स्फूर्ति पानेवाले, नृत्यके उल्लासके अधीन हैं, अर्थात् श्रीजगन्नाथकी यात्रामें रथके सामने प्रेममें विभोर होकर जो नृत्य करते रहते हैं, एवं हर्ष पूर्वक नामसंकीर्तन करनेवाले वैष्णवजनोंके द्वारा जो चारों ओरसे घिरे हुए हैं॥७॥

    भुवं सिञ्चन्नश्रु-स्रुतिभिरभितः सान्द्र-पुलकैः
    परीताङ्गो नीप-स्तबक-नव-किञ्जल्क-जयिभिः।
    घन-स्वेद-स्तोम-स्तिमित-तनुरुत्कीर्तन-सुखी
    स चैतन्यः किं मे पुनरपि दृशोर्यास्यति पदम्॥८॥

    वे श्रीचैतन्यमहाप्रभु फिर भी मेरे दृष्टिगोचर होंगे क्या? जो कि अपने नेत्रोंकी जलधाराओंके द्वारा, भूमिका अभिषेक करते रहते हैं एवं कदम्बके पुष्पगुच्छोंकी केसरको जीतनेवाले, अपने घने रोमांचोंके द्वारा, जिनका श्रीअङ्ग सर्वतोभावसे व्याप्त रहता है एवं जिनका श्रीविग्रह गाढ़े स्वेदसमुदायसे प्रायः गीला बना रहता है एवं जो उत्कीर्तनमें अर्थात् खड़े होकर, भुजा उठाकर, उद्दण्डकीर्तन करनेमें ही सुखी रहते हैं॥८॥

    अधीते गौराङ्ग-स्मरण-पदवी-मङ्गलतरं
    कृती  यो  विश्रम्भ-स्फुरदमलधीरष्टकमिदम्।
    परानन्दे  सद्यस्तदमल-पदाम्भोज-युगले
    परिस्फारा तस्य स्फुरतु नितरां प्रेमलहरी॥९॥

    इस अष्टकके पाठके फलका निर्देश करते हुए श्रीरूप गोस्वामी कहते हैं कि—
    विश्वाससे शोभायमान विशुद्ध बुद्धिवाला सौभाग्यशाली जो कोई व्यक्ति, श्रीचैतन्यदेवके स्मरणमय मार्गमें अतिशय मंगलदायक, इस "श्रीचैतन्याष्टक" का पाठ करता है, उसके हृदयमें, श्रीचैतन्यमहाप्रभुके परमानन्दमय दोनों चरणारविन्दोंमें, विस्तीर्ण प्रेमकी लहरी विशेष स्फूर्ति पाती रहे; यह अष्टककारका आशीर्वाद है॥९॥


    श्रीकुञ्जविहार्यष्टकम्

    श्रील रूप गोस्वामी

    इन्द्रनीलमणि-मंजुल-वर्णः
    फुल्लनीप-कुसुमाञ्चित-कर्णः ।
    कृष्णलाभिरकृशोरसि हारी
    सुन्दरो जयति कुञ्जविहारी ॥१॥

    जिनका वर्ण इन्द्रनीलमणिके समान मनोहर है, जिनके कर्णयुगल विकसित कदम्बके पुष्पोंसे सुशोभित हैं एवं जिनके विशाल वक्षःस्थलपर मनोहर गुञ्जाओंका हार विराजमान है, परमसुन्दर वे कुञ्जविहारी श्रीकृष्ण जययुक्त हों॥१॥

    राधिका-वदनचन्द्र-चकोरः
    सर्वबल्लववधू-धृतिचौरः ।
    चर्चरी-चतुरताञ्चित-चारी-
    चारुतो जयति कुञ्जविहारी ॥२॥

    जो श्रीमती राधिकाके मुखचन्द्रके चकोरस्वरूप हैं एवं जो समस्त गोपियोंके धैर्यको चुरानेवाले हैं तथा जो चर्चरी नामक ताल-विशेषमें चतुरतासे सुशोभित मनोहर नृत्य करते हैं, वे कुञ्जविहारी श्रीकृष्ण जययुक्त हों॥२॥

    सर्वतः प्रथित-कौलिकपर्व-
    ध्वंसनेन हृत-वासव-गर्वः ।
    गोष्ठ-रक्षण-कृते गिरिधारी
    लीलया जयति कुञ्जविहारी ॥३॥

    सर्वत्र सुप्रसिद्ध एवं गोपोंकी कुल-परम्परासे प्राप्त इन्द्रकी पूजा रूप पर्वको ध्वंसकर, जिन्होंने इन्द्रके गर्वका हरण किया एवं व्रजकी रक्षाके लिये जिन्होंने खेल-खेलमें अनायास ही गिरिराज गोवेर्धनको धारण कर लिया है, वे कुञ्जविहारी श्रीकृष्ण जययुक्त हों॥३॥

    रागमण्डल-विभूषित-वंशी-
    विभ्रमेण मदनोत्सव-शंसी ।
    स्तूयमान-चरितः शुकशारी-
    श्रेणिभिर्जयति कुञ्जविहारी ॥४॥

    अनेक राग-रागिनियोंसे विभूषित वंशी-विलासके द्वारा जो गोपियोंके प्रति प्रेम-महोत्सवकी घोषणा करते रहते हैं एवं वंशीध्वनिके माधुर्यमें अनुरक्त शुक-शारिकाओंकी श्रेणीके द्वारा जिनके चरित्रकी प्रशंसा की जा रही है, वे कुञ्जविहारी श्रीकृष्ण जययुक्त हों॥४॥

    शातकुम्भ-रुचिहारि-दुकूलः
    केकि-चन्द्रक-विराजित-चूलः ।
    नव्ययौवन-लसद्‌ व्रजनारी-
    रंजनो जयति कुञ्जविहारी ॥५॥

    जिनका पीताम्बर सुवर्णकी कान्तिका तिरस्कार करनेवाला है एवं जिनका मुकुट मयूरपुच्छसे सुशोभित है तथा नवीनयौवनसे दीप्त व्रजाङ्गनाओंका जो अनुरञ्जन करते रहते हैं, वे कुञ्जविहारी श्रीकृष्ण जययुक्त हों ॥५॥

    स्थासकीकृत-सुगन्धि-पटीरः
    स्वर्णकाञ्चि-परिशोभि-कटीरः ।
    राधिकोन्नत-पयोधर-वारी-
    कुञ्जरो जयति कुञ्जविहारी ॥६॥

    जिनके श्रीअङ्ग सुगन्धित चन्दनसे अभिषिक्त है एवं जिनका कटिप्रदेश सुवर्णमयी मेखलासे सुशोभित है तथा जिनके लिये श्रीमती राधिकाके उन्नत पयोधर हस्ति-बन्धन-शृङ्खला स्वरूप हैं अर्थात् हाथीको बाँधनेकी शृङ्खलामें हाथी जैसे निबद्ध हो जाता है, उसी प्रकार श्रीकृष्ण भी श्रीमती राधिकाके पयोधरोंकी शोभासे निबद्ध हैं। ऐसे कुञ्जविहारी श्रीकृष्ण जययुक्त हों॥६॥

    गौरधातु-तिलकोज्ज्वल-भालः
    केलि-चंचलित-चम्पक-मालः ।
    अद्रि-कन्दर-गृहेष्वभिसारी
    सुभ्रुवां जयति कुञ्जविहारी ॥७॥

    जिनका विशाल मस्तक गौरवर्णकी धातुओंके द्वारा विरचित तिलकसे परम उज्ज्वल है, जिनके गलेमें विराजमान चम्पाके पुष्पोंकी माला, विलासपूर्वक झूल रही है एवं जो गोवर्धनादि पर्वतोंकी गुहारूप गृहोंमें सुन्दर नेत्रोंवाली गोपियोंका अभिसार करते रहते हैं, वे कुञ्जविहारी श्रीकृष्ण जययुक्त हों॥७॥

    विभ्रमोच्चल-दृगंचल-नृत्य-
    क्षिप्त-गोप-ललनाखिल-कृत्यः ।
    प्रेममत्त-वृषभानु-कुमारी-
    नागरो जयति कुञ्जविहारी ॥८॥

    स्मर-विलासके द्वारा चञ्चल अपने नेत्रप्रान्तोंके नृत्यसे जो गोपाङ्गनाओंके गृहसम्बन्धी समस्त कार्योंको निवृत करनेवाले हैं एवं जो प्रेमोन्मत्त श्रीवृषभानुनन्दिनीके नागर हैं, वे कुञ्जविहारी श्रीकृष्ण जययुक्त हों॥८॥

    अष्टकं मधुर-कुञ्जविहारि-
    क्रीडया पठति यः किल हारि ।
    स प्रयाति विलसत्परभागं
    तस्य पादकमलार्चन-रागम् ॥९॥

    जो व्यक्ति कुञ्जविहारी श्रीकृष्णकी मधुरक्रीड़ासे मनोहर इस अष्टकका प्रेमपूर्वक पाठ करता है, वह दिव्य गुणोंसे युक्त होकर श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी सेवाके प्रबल अनुरागको प्राप्त कर लेता है। इस अष्टकमें "स्वागता" नामक छन्द है॥९॥


    श्रीराधिकाष्टकम् (१)

    श्रील रूपगोस्वामीपाद विरचितम्‌

    दिशि दिशि रचयन्तीं संचरन्नेत्रलक्ष्मी-
    विलसित-खुरलीभिः खञ्जरीटस्य खेलाम्।
    हृदयमधुपमल्लीं बल्लवाधीशसूनो–
    रखिल-गुण-गभीरां राधिकामर्चयामि॥१॥

    मैं, उन श्रीमती राधिकाकी पूजा करता हूँ कि, जो प्रत्येक दिशामें विचरण करनेवाले, अपने नेत्रोंकी शोभारूप विलासोंके पटु निरीक्षणके द्वारा, खञ्जनपक्षीके खेलकी रचना करती रहती हैं, अर्थात् श्रीमती राधिका जिस दिशाकी ओर दृष्टिपात करती हैं, वह दिशा मानों खञ्जनमालासे व्याप्त हो जाती है। तात्पर्य—जिनके नेत्रयुगल खञ्जनके समान हैं एवं जो नन्दनन्दन श्रीकृष्णके हृदयरूप भ्रमरके लिए, मल्लिकाके पुष्पके समान है। भ्रमरके लिए मल्लिका जिस प्रकार आनन्ददायिनी है, उसी प्रकार श्रीमती राधिका श्रीकृष्णके हृदयके लिए आनन्ददायिनी हैं तथा जो समस्त गुणोंके कारण अतिशय गम्भीर हैं॥१॥

    पितुरिह वृषभानोरन्ववाय-प्रशस्तिं
    जगति किल समस्ते सुष्ठु विस्तारयन्तीम्।
    व्रजनृपतिकुमारं खेलयन्तीं सखीभिः
    सुरभिणि निजकुण्डे राधिकामर्चयामि॥२॥

    मैं, उन श्रीमती राधिकाजीकी पूजा करता हूँ, जो अपने पिता श्रीवृषभानुजी महाराजके वंशकी प्रतिष्ठाको समस्त जगत्‌में भली प्रकार विस्तारित करती रहती हैं एवं जो पुष्पोंके परागसे सुगन्धित अपने कुण्डमें ललिता आदि अपनी सखियोंके सहित व्रजराजकुमार श्रीकृष्णको खेल कराती रहती हैं॥२॥

    शरदुपचित-राका-कौमुदीनाथ-कीर्त्ति-
    प्रकर-दमनदीक्षा-दक्षिण-स्मेरवक्‍त्राम्।
    नटदघभिदपाङ्गोत्तुङ्गितानङ्ग-रङ्गां
    कलित-रुचि-तरङ्गां राधिकामर्चयामि॥३॥

    श्रीमती राधिकाके अनुपम मुखमण्डलका एवं माधुर्यकी आधारताका वर्णन करते हुए कहते हैं कि— मैं, उन श्रीमती राधिकाकी पूजा करता हूँ, जिनका मन्दहास्ययुक्त मुखारविन्द, शरद्-ऋतुमें वृद्धिको प्राप्त चन्द्रमाकी कीर्त्तिके समूहको दमन करनेकी दीक्षामें निपुण है अर्थात् शरद् ऋतुके पूर्णचन्द्रसे भी मनोहर है एवं श्रीकृष्णके चञ्चल कटाक्षपातसे जिनमें प्रेमकी तरङ्गें सन्दीप्त हो रही हैं तथा जिनके श्रीअङ्गमें शोभाकी तरङ्गें नृत्य करती रहती हैं॥३॥

    विविध-कुसुम-वृन्दोत्फुल्ल-धम्मिल्ल-धाटी-
    विघटित-मद-घूर्णत्-केकि-पिच्छ-प्रशस्तिम्।
    मधुरिपु-मुख-बिम्बोद्गीर्ण-ताम्बूल-राग-
    स्फुरदमल-कपोलां  राधिकामर्चयामि॥४॥

    मैं, उन श्रीमती राधिकाजीकी पूजा करता हूँ, जो अनेक प्रकारके विकसित पुष्प-समूहसे सुसज्जित अपने केशपाशके बलपूर्वक आक्रमणके द्वारा, आनन्दमें नृत्य करते हुए मयूरके पङ्खोॱकी शोभाको तिरस्कृत करनेवाली हैं एवं जिनके निर्मल कपोल, श्रीकृष्णके मुखबिम्बसे निकलते हुए ताम्बूलरसकी लालिमासे स्फूर्ति पा रहे हैं॥४॥

    अमलिन-ललितान्तःस्नेह-सिक्तान्तरङ्गा-
    मखिल-विधविशाखा-सख्य-विख्यात-शीलाम्।
    स्फुरदघभिदनर्घ-प्रेम-माणिक्य-पेटीं
    धृत-मधुर-विनोदां राधिकामर्चयामि॥५॥

    मैं, उन श्रीमती राधिकाजीकी पूजा करता हूँ, जिनका अन्तःकरण ललिता सखीके निर्मल आन्तरिक स्नेहसे सिक्त (सरस) रहता है एवं जिनका शील स्वभाव विशाखा सखीकी समस्त प्रकारकी मित्रतासे विख्यात है एवं जो श्रीकृष्णके प्रकट प्रेमरूपी अमूल्य रत्नोंकी मञ्जूषा स्वरूप हैं तथा जो मधुरविनोदको धारण करती रहती हैं॥५॥

    अतुल-महसि वृन्दारण्यराज्येऽभिषिक्तां
    निखिल-समय-भर्तुः कार्तिकस्याधिदेवीम्।
    अपरिमित-मुकुन्द-प्रेयसी-वृन्दमुख्यां
    जगदघहर-कीर्तिं राधिकामर्चयामि॥६॥

    मैं, उन श्रीमती राधिकाजीकी पूजा करता हूँ, जो अतुलनीय महिमायुक्त श्रीवृन्दावनके राजपदपर अभिषिक्त हैं (ब्रह्ममोहनलीलामें एक कोनेमें ही करोड़ों ब्रह्माण्डोंके दृष्टिगोचर करा देनेसे एवं वैकुण्ठसे भी अतिशय श्रेष्ठ मथुरामण्डलके भी उत्तम प्रदेश होनेके कारण वृन्दावनका प्रभाव अतुलनीय है। यह वृन्दावन सर्वदा वसन्तऋतुसे सेवित होनेके कारण एवं आनन्दमय श्रीकृष्णके द्वारा अधिष्ठित होनेके कारण सर्वदा उत्सवरूप बना रहता है), अतः इस प्रकारके वृन्दावनके राज्यके आधिपत्यसे श्रीमती राधिकाका उत्कर्ष पराकाष्ठाको प्राप्त कर रहा है (श्रीमती राधिकाके राज्याभिषेककी कथा श्रीरूपगोस्वामी–कृत "श्रीदानकेलिकौमुदी" नामक ग्रन्थमें निबद्ध है), जो राधिका सभी मासोंके अधिपति कार्तिकमासकी अधिष्ठात्री देवी हैं तथा श्रीकृष्णकी असंख्य प्रेयसीवृन्दमें मुख्या हैं अर्थात् जो श्रीकृष्णकी पट्टमहिषी हैं और जिनकी कीर्त्ति समस्त जगत्‌के पापोंको हरनेवाली है, मैं उन श्रीमती राधिकाजीकी पूजा करता हूँ॥६॥

    हरिपदनख-कोटी-पृष्ठ-पर्यन्त-सीमा-
    तटमपि कलयन्तीं प्राणकोटेरभीष्टम्।
    प्रमुदित-मदिराक्षी-वृन्द-वैदग्ध्य-दीक्षा-
    गुरुमति-गुरुकीर्तिं राधिकामर्चयामि॥७॥

    श्रीमती राधिकाके लोकोत्तर पतिव्रता धर्मको दिखाते हुए कहते हैं—मैं, उन श्रीमती राधिकाकी पूजा करता हूँ, जो श्रीकृष्णके पादपद्मोंके सूक्ष्म नखाग्र–भागको अपने करोड़ों प्राणोंकी अपेक्षा अधिक प्रियतम जानती हैं अर्थात् जो कृष्णप्राण हैं एवं उनसे भिन्न कुछ भी नहीं जानती हैं तथा जो हर्षभरी गोपाङ्गनाश्रेणीको अनेक प्रकारकी चातुरीकी शिक्षा देनेमें दीक्षागुरु हैं और जिनकी महती कीर्त्ति विद्यमान है॥७॥

    अमल-कनक-पट्टोद्घृष्ट-काश्मीर-गौरीं
    मधुरिम-लहरीभिः संपरीतां किशोरीम्।
    हरिभुज-परिरब्धां लब्ध-रोमाञ्च-पालिं
    स्फुरदरुण-दुकूलां राधिकामर्चयामि॥८॥

    श्रीराधिकाके माधुर्यका वर्णन करते हुए कहते हैं— मैं, उन श्रीमती राधिकाजीकी पूजा करता हूँ, जो निर्मल स्वर्ण–पाषाणपर पीसे हुए कुङ्कुमके समान गौरवर्णवाली हैं एवं जो माधुर्यकी तरङ्गोंसे परिव्याप्त हैं, नित्य किशोरी हैं तथा जो श्रीकृष्णकी भुजाओंसे आलिङ्गित होते ही पुलकावलीको प्राप्त हो जाती हैं और जिनकी ओढ़नी चमकीले अरुण वर्णवाली है॥८॥

    तदमल-मधुरिम्णां काममाधाररूपं
    परिपठति वरिष्ठं सुष्ठु राधाष्टकं यः।
    अहिम-किरण-पुत्री-कूल-कल्याण-चन्द्रः
    स्फुटमखिलमभीष्टं तस्य तुष्टस्तनोति॥९॥

    जो व्यक्ति, श्रीमती राधिकाजीके स्वरूप, गुण, विभूति आदि माधुर्योंके यथेष्ट आधारस्वरूप इस उत्कृष्ट "राधिकाष्टक" का भली प्रकार प्रेमपूर्वक पाठ करता है, उस व्यक्तिके समस्त अभीष्टको सूर्यपुत्री यमुनाके कमनीय कूलके कल्याणचन्द्र श्रीकृष्णचन्द्र प्रसन्न होकर स्पष्ट ही पूर्ण करते हैं। इस अष्टकमें "मालिनी" नामक छन्द है॥९॥