चातुर्मास्य (श्रावण मास) स्तोत्र

  • श्रीगुर्वष्टकम्
  • श्रीप्रभुपाद-पद्म-स्तवकः
  • श्रीषड-गोस्वाम्यष्टकम्‌
  • श्रीनित्यानन्दाष्टकम्‌
  • श्रीशचीतनयाष्टकम्‌
  • श्रीकृष्णचन्द्राष्टकम्
  • श्रीराधिकाष्टकम् (३)
  • श्रीगुर्वष्टकम्

    श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर

    संसार-दावानल-लीढ़-लोक
    त्राणाय कारुण्यघनाघनत्वम् ।
    प्राप्तस्य कल्याण-गुणार्णवस्य
    वन्दे गुरोः श्रीचरणारविन्दम् ॥१॥

    संसाररूपी-दावानलसे सन्तप्त लोगोंकी रक्षाके लिए जो करुणाके घने मेघस्वरूप होकर कृपावारि वर्षण करते हैं, मैं उन्हीं कल्याणगुणनिधि श्रीगुरुदेवके पादपद्मोंकी वन्दना करता हूँ।

    महाप्रभोः कीर्त्तन-नृत्य-गीत
    वादित्रमाद्यन्मनसो रसेन ।
    रोमाञ्च-कम्पाश्रु-तरङ्ग-भाजो
    वन्दे गुरोः श्रीचरणारविन्दम् ॥२॥

    सङ्कीर्त्तन, नृत्य, गीत तथा वाद्यादिके द्वारा उन्मत्तचित्त श्रीमन्महाप्रभुके प्रेमरसमें जिनके रोमाञ्च, कम्प और अश्रु तरङ्ग उद्गत होते हैं, मैं उन्हीं श्रीगुरुदेवके पादपद्मोंकी वन्दना करता हूँ।

    श्रीविग्रहाराधन-नित्य नाना
    शृङ्गार तन्मन्दिर-मार्ज्जनादौ ।
    युक्तस्य भक्तांश्च नियुञ्जतोऽपि
    वन्दे गुरोः श्रीचरणारविन्दम् ॥३॥

    जो श्रीभगवद्विग्रहकी नित्य-सेवा, शृङ्गाररसोद्दीपक तरह-तरहकी वेश रचना और श्रीमन्दिरके मार्जन आदि सेवाओंमें स्वयं नियुक्त रहते हैं तथा (अनुगत) भक्तजनको नियुक्त करते हैं, मैं उन्हीं श्रीगुरुदेवके पादपद्मोंकी वन्दना करता हूँ।

    चतुर्विध-श्रीभगवत्प्रसाद
    स्वाद्वन्नतृप्तान् हरिभक्तसङ्घान् ।
    कृत्वैव तृप्तिं भजतः सदैव
    वन्दे गुरोः श्रीचरणारविन्दम् ॥४॥

    जो श्रीकृष्णभक्त-वृन्दको चर्व्य, चुष्य, लेह्य और पेय-इन चतुर्विध रस-समन्वित सुस्वादु महाप्रसादान्न द्वारा परितृप्त कर (अर्थात् प्रसाद-सेवनके द्वारा प्रपञ्चनाश और प्रेमानन्दका उदय करवाकर) स्वयं तृप्ति लाभ करते हैं, उन्हीं श्रीगुरुदेवके पादपद्मोंकी मैं वन्दना करता हूँ।

    श्रीराधिका-माधवयोरपार
    माधुर्य्य-लीला-गुण-रूप-नाम्नाम् ।
    प्रतिक्षणास्वादन लोलुपस्य
    वन्दे गुरोः श्रीचरणारविन्दम् ॥५॥

    जो राधामाधवके अनन्त माधुर्यमय नाम, रूप, गुण और लीला समूहका आस्वादन करनेके लिए सर्वदा लुब्धचित्त हैं, उन्हीं श्रीगुरुदेवके पादपद्मोंकी मैं वन्दना करता हूँ।

    निकुञ्जयूनो रतिकेलिसिद्धै
    यां यालिभिर्युक्तिरपेक्षणीया ।
    तत्रातिदाक्ष्यादतिवल्लभस्य
    वन्दे गुरोः श्रीचरणारविन्दम् ॥६॥

    निकुञ्ज बिहारी 'ब्रज-युव-द्वन्द्व' के रतिक्रीड़ा-साधनके निमित्त सखियाँ जिन युक्तियोंका अवलम्बन करती हैं, उस विषयमें अति निपुण होनेके कारण जो उनके अतिशय प्रिय हैं, उन्हीं श्रीगुरुदेवके पादपद्मोंकी मैं वन्दना करता हूँ।

    साक्षाद्धरित्वेन समस्तशास्त्रै
    रुक्तस्तथा भाव्यत एव सद्भिः ।
    किन्तु प्रभोर्यः प्रिय एव तस्य
    वन्दे गुरोः श्रीचरणारविन्दम् ॥७॥

    निखिल शास्त्रोंने जिनका साक्षात् हरिके अभिन्न-विग्रहरूपसे गान किया है एवं साधुजन भी जिनकी उसी प्रकारसे चिन्ता किया करते हैं, तथापि जो प्रभु भगवानके एकान्त प्रिय हैं, उन्हीं (भगवान्के अचिन्त्य-भेदाभेद-प्रकाश-विग्रह) श्रीगुरुदेवके पादपद्मोंकी मैं वन्दना करता हूँ।

    यस्य प्रसादाद्भगवत्प्रसादोः
    यस्याप्रसादान्न गतिः कुतोऽपि ।
    ध्यायंस्तुवंस्तस्य यशस्त्रिसन्ध्यं
    वन्दे गुरोः श्रीचरणारविन्दम् ॥८॥

    एकमात्र जिनकी कृपा द्वारा ही भगवद्-अनुग्रह लाभ होता है, जिनके अप्रसन्न होनेसे जीवोंका कहीं भी निस्तार नहीं है, मैं त्रिसन्ध्या उन्हीं श्रीगुरुदेवकी कीर्ति्त समूहका स्तव और ध्यान करते-करते उनके पादपद्मोंकी वन्दना करता हूँ।

    श्रीमद्गुरोरष्टकमेतदुच्चै-
    र्ब्राह्मे मुहूर्त्ते पठति प्रयत्नात् ।
    यस्तेन वृन्दावन-नाथ साक्षात्
    सेवैव लभ्या जनुषोऽन्त एव ॥९॥

    जो व्यक्ति इस गुरुदेवाष्टकका ब्राह्म मुहूर्त्तमें (अरुणोदयसे चार दण्ड पहले) अतिशय यत्नके साथ उच्चस्वरसे पाठ करते हैं, वे वस्तु-सिद्धिके समय वृन्दावनचन्द्रका सेवाधिकार प्राप्त करते हैं।


    श्रीप्रभुपादपद्म-स्तवकः

    श्रील भक्तिरक्षक-श्रीधर गोस्वामी महाराज-विरचितम्‌

    सुजनार्बुदराधितपादयुगं
    युगधर्मधुरन्धर पात्रवरम् ।
    वरदाभयदायक-पूज्यपदं
    प्रणमामि सदा प्रभुपादम् ॥१॥

    मैं कोटि-कोटि सज्जनोंके द्वारा आराधित, कृष्ण सङ्कीर्त्तन युग-धर्मके संस्थापक, विश्ववैष्णव राजसभाके पात्रराज अर्थात् अधिकारीवर्गमें श्रेष्ठतम, निखिल जीवोंके भय दूर करनेवालोंकी भी मनोकामना पूर्ण करनेवाले, सर्वपूज्य उन श्रील प्रभुपादके श्रीचरणकमलोंमें सदा-सर्वदा प्रणाम करता हूँ।

    भजनोर्जितसज्जनसङ्घपतिं
    पतिताधिककारुणिकैकगतिम् ।
    गतिवञ्चितवञ्चकाचिन्त्यपदं
    प्रणमामि सदा प्रभुपादपदम् ॥२॥

    जो भजन-सम्पन्न सज्जन-वृन्दोंके अधिपति हैं, जो पतितजनोंके प्रति अति करुणामय तथा उनकी एकमात्र गति हैं एवं जो वञ्चकोंके भी वञ्चक हैं, मैं उन श्रीलप्रभुपादके अचिन्त्य चरणकमलोंमें सदा-सर्वदा प्रणाम करता हूँ।

    अतिकोमलकाञ्चनदीर्घतनुं
    तनुनिन्दितहेममृणालमदम् ।
    मदनार्बुदवन्दितचन्द्रपदं
    प्रणमामि सदा प्रभुपादपदम् ॥३॥

    अतिकोमल काञ्चनवर्णवाले सुदीर्घ तनु जिसके द्वारा स्वर्णमय कमलनालोंकी मत्तता (सौन्दर्य) भी निन्दित होती है, जिन नख-चन्द्रोंकी वन्दना कोटि-कोटि कामदेव करते हैं, मैं उन श्रीलप्रभुपादके चरणकमलोंमें सदा-सर्वदा प्रणाम करता हूँ।

    निजसेवकतारकरञ्जिविधुं
    विधूताहितहुङ्कृतसिंहवरम् ।
    वरणागतबालिश-शन्दपदं
    प्रणमामि सदा प्रभुपादपदम् ॥४॥

    जो नक्षत्र-मण्डलको रंजित करनेवाले चन्द्रकी तरह सेवक-मण्डली द्वारा परिवेष्टित होकर उनके चित्तको प्रफुल्लित रखते हैं, भक्तिविद्वेषिजन जिनके सिंहनादसे भयभीत रहते हैं एवं निरीह व्यक्ति जिनके चरणकमलोंका आश्रय ग्रहणकर परम कल्याण लाभ करते हैं, मैं उन श्रीलप्रभुपादके चरणकमलोंमें सदा-सर्वदा प्रणाम करता हूँ।

    विपुलीकृतवैभवगौरभुवं
    भुवनेषु विकीर्ति्तत गौरदयम् ।
    दयनीयगणार्पित-गौरपदं
    प्रणमामि सदा प्रभुपादपदम् ॥५॥

    जिन्होंने श्रीगौरधामका (श्रीनवद्वीपधामका) विपुल ऐश्वर्य प्रकटित किया है, जिन्होंने श्रीगौराङ्गदेवकी महोदारताकी कथाओंका सम्पूर्ण विश्वमें प्रचार किया है एवं जिन्होंने अपने कृपापात्रोंके हृदयमें श्रीगौरपादपद्मकी स्थापना की है, मैं उन श्रीलप्रभुपादके चरणकमलोंमें सदा-सर्वदा प्रणाम करता हूँ।

    चिरगौरजनाश्रयविश्वगुरुं
    गुरु-गौरकिशोरक-दास्यपरम् ।
    परमादृतभक्तिविनोदपदं
    प्रणमामि सदा प्रभुपादपदम् ॥६॥

    जो चैतन्यमहाप्रभुके आश्रितजनोंके नित्य आश्रयस्थल और जगद्गुरु हैं, जो अपने गुरु श्रीगौरकिशोरके सेवापरायण हैं एवं जो श्रीभक्तिविनोद ठाकुरके सम्बन्धमात्रसे ही परम आदरयुक्त हैं, मैं उन श्रीलप्रभुपादके चरणकमलोंमें सदा-सर्वदा प्रणाम करता हूँ।

    रघुरूपसनातनकीर्ति्तधरं
    धरणीतलकीर्ति्ततजीवकविम् ।
    कविराज नरोत्तमसख्यपदमं
    प्रणमामि सदा प्रभुपादपदम् ॥७॥

    जो श्रीरूप, सनातन और रघुनाथके कीर्ति्तरूपी झण्डेका उत्तोलनकर विराजमान हैं, अनेक लोग इस धरणीतलपर जिन्हें पाण्डित्य-प्रतिभामय जीव गोस्वामीसे अभिन्न तनु कहकर उनकी प्रशंसा किया करते हैं एवं जिनका श्रीलकृष्णदास कविराज तथा ठाकुर नरोत्तमसे सख्यभाव है, मैं उन श्रीलप्रभुपादके चरणकमलोंमें सदा-सर्वदा प्रणाम करता हूँ।

    कृपया हरिकीर्त्तनमूर्ति्तधरं
    धरणीभरहारक-गौरजनम् ।
    जनकाधिकवत्सल स्निग्धपदं
    प्रणमामि सदा प्रभुपादपदम् ॥८॥

    जीवोंके प्रति असीम कृपाकर जो मूर्ति्तमान हरिकीर्त्तनरूपमें प्रकाशित हैं, जो धरणीके पापभारको दूर करनेवाले गौरपार्षद हैं एवं जो जीवोंके प्रति पितासे भी अधिक वात्सल्यके सुकोमल आकरस्वरूप हैं, मैं उन श्रीलप्रभुपादके चरणकमलोंमें सदा-सर्वदा प्रणाम करता हूँ।

    शरणागतकिङ्करकल्पतरुं
    तरुधिक्कृतधीरवदान्यवरम् ।
    वरदेन्द्रगणार्चितदिव्यपदं
    प्रणमामि सदा प्रभुपादपदम् ॥९॥

    शरणागत किङ्करोंके लिए (अभीष्ट प्रदान करनेमें) जो कल्पतरुके समान हैं, जिनकी सहिष्णुता और उदारता वृक्षोंको भी लज्जित करती हैं एवं वरदाताओंमें श्रेष्ठ व्यक्ति भी जिनके दिव्य श्रीचरणकमलोंकी पूजा किया करते हैं, मैं उन श्रीलप्रभुपादके चरणकमलोंमें सदा-सर्वदा प्रणाम करता हूँ।

    परहंसवरं परमार्थपतिं
    पतितोद्धरणे कृतवेशयतिम् ।
    यतिराजगणैः परिसेव्यपदं
    प्रणमामि सदा प्रभुपादम् ॥१०॥

    जो परमहंसकुलके चूड़ामणि हैं, जो परम पुरुषार्थ श्रीकृष्णपे्रम-सम्पत्तिके मालिक हैं, पतित जीवोंके उद्धारके लिए जिन्होंने संन्यासीका वेश धारण किया है एवं श्रेष्ठ त्रिदण्डि संन्यासियोंका समूह जिनके पादपद्मोंकी सेवा करता है, मैं उन श्रीलप्रभुपादके चरणकमलोंमें सदा-सर्वदा प्रणाम करता हूँ।

    वृषभानुसुतादयितानुचरं
    चरणाश्रित रेणुधरस्तमहम् ।
    महदद्भुतपावनशक्तिपदं
    प्रणमामि सदा प्रभुपादम् ॥११॥

    जो वृषभानुनन्दिनीके परमप्रिय अनुचर हैं, जिनकी चरण-रजको मैं अपने मस्तकपर धारण करनेके सौभाग्यके लिए अभिमान करता हूँ, उन अद्भुत पावनीशक्तिसम्पन्न श्रीलप्रभुपादके चरणकमलोंमें मैं सदा-सर्वदा प्रणाम करता हूँ।


    श्रीषड्‌गोस्वाम्यष्टकम्‌

    श्रील श्रीनिवासाचार्य विरचितम्‌

    कृष्णोत्कीर्तन-गान-नर्तन-परौ प्रेमामृताम्भोनिधी
    धीराधीरजन-प्रियौ  प्रियकरौ  निर्मत्सरौ पूजितौ ।
    श्रीचैतन्य-कृपाभरौ भुवि भुवो भारावहन्तारकौ
    वन्दे रूप-सनातनौ रघुयुगौ श्रीजीव-गोपालकौ ॥१॥

    मैं, श्रीरूप, सनातन, रघुनाथभट्ट, रघुनाथदास, श्रीजीव एवं गोपालभट्ट नामक इन छः गोस्वामियोंकी वन्दना करता हूँ कि, जो श्रीकृष्णके नाम-रूप-गुण-लीलाओंके कीर्तन, गायन एवं नृत्यपरायण थे; प्रेमामृतके समुद्रस्वरूप थे, विद्वान् एवं अविद्वान्रूप सर्वसाधारण जनमात्रके प्रिय थे तथा सभीके प्रियकार्योंको करनेवाले थे, मात्सर्यरहित एवं सर्वलोक पूजित थे, श्रीचैतन्यदेवकी अतिशय कृपासे युक्त थे, भूतलमें भक्तिका विस्तार करके भूमिका भार उतारनेवाले थे।

    नानाशास्त्र-विचारणैक-निपुणौ सद्धर्म-संस्थापकौ
    लोकानां हितकारिणौ त्रिभुवने मान्यौ शरण्याकरौ ।
    राधाकृष्ण-पदारविन्द-भजनानन्देन मत्तालिकौ
    वन्दे रूप-सनातनौ रघुयुगौ श्रीजीव-गोपालकौ ॥२॥

    मैं, श्रीरूप-सनातनादि उन छः गोस्वामियोंकी वन्दना करता हूँ कि, जो अनेक शास्त्रोंके गूढ़तात्पर्य विचार करनेमें परमनिपुण थे, भक्तिरूप-परमधर्मके संस्थापक थे, जनमात्रके परमहितैषी थे, तीनों लोकोंमें माननीय थे, शरणागतवत्सल थे एवं श्रीराधाकृष्णके पदारविन्दके भजनरूप आनन्दसे मत्तमधुपके समान थे।

    श्रीगौरांग-गुणानुवर्णन-विधौ श्रद्धा-समृद्धय्न्वितौ
    पापोत्ताप-निकृन्तनौ तनुभृतां गोविन्द-गानामृतैः ।
    आनन्दाम्बुधि-वर्धनैक-निपुणौ कैवल्य-निस्तारकौ
    वन्दे रूप-सनातनौ रघुयुगौ श्रीजीव-गोपालकौ ॥३॥

    मैं, श्रीरूप-सनातनादि उन छः गोस्वामियोंकी वन्दना करता हूँ कि, जो श्रीगौराङ्गदेवके गुणानुवादकी विधिमें श्रद्धारूप-सम्पत्तिसे युक्त थे, श्रीकृष्णके गुणगानरूप-अमृतकी वृष्टिके द्वारा प्राणीमात्रके पाप-तापको दूर करनेवाले थे तथा आनन्दरूप-समुद्रको बढ़ानेमें परमकुशल थे, भक्तिका रहस्य समझाकर, मुक्तिकी भी मुक्ति करनेवाले थे।

    त्यक्त्वा तूर्णमशेष-मण्डलपति-श्रेणीं सदा तुच्छवत्
    भूत्वा दीनगणेशकौ करुणया कौपीन-कन्थाश्रितौ ।
    गोपीभाव-रसामृताब्धि-लहरी-कल्लोल-मग्नौ मुहु-
    र्वन्दे रूप-सनातनौ रघुयुगौ श्रीजीव-गोपालकौ ॥४॥

    मैं, श्रीरूप-सनातनादि उन छः गोस्वामियोंकी वन्दना करता हूँ कि, जो समस्त मण्डलोंके आधिपत्यकी श्रेणीको, लोकोत्तर वैराग्यसे शीघ्र ही तुच्छकी तरह सदाके लिए छोड़कर, कृपापूर्वक अतिशय दीन होकर, कौपीन एवं कंथा (गूदड़ी) को धारण करनेवाले थे तथा गोपीभावरूप रसामृतसागरकी तरंगोंमें आनन्दपूर्वक निमग्न रहते थे।

    कूजत्-कोकिल-हंस-सारस-गणाकीर्णे मयूराकुले
    नानारत्न-निबद्ध-मूल-विटप-श्रीयुक्त-वृन्दावने ।
    राधाकृष्णमहर्निशं प्रभजतौ जीवार्थदौ यौ मुदा
    वन्दे रूप-सनातनौ रघुयुगौ श्रीजीव-गोपालकौ ॥५॥

    मैं, श्रीरूप-सनातनादि उन छः गोस्वामियोंकी वन्दना करता हूँ कि, जो कलरव करनेवाले कोकिल-हंस-सारस आदि पक्षिओंकी श्रेणीसे व्याप्त एवं मयूरोंके केकारवसे आकुल, तथा अनेक प्रकारके रत्नोंसे निबद्ध मूलवाले वृक्षोंके द्वारा शोभायमान श्रीवृन्दावनमें, रातदिन श्रीराधाकृष्णका भजन करते रहते थे तथा जीवमात्रके लिए हर्षपूर्वक भक्तिरूप परमपुरुषार्थ देनेवाले थे।

    संख्यापूर्वक-नामगाननतिभिः कालावसानीकृतौ
    निद्राहार-विहारकादि-विजितौ चात्यन्त-दीनौ च यौ ।
    राधाकृष्ण-गुणस्मृतेर्मधुरिमानन्देन सम्मोहितौ
    वन्दे रूप-सनातनौ रघुयुगौ श्रीजीव-गोपालकौ ॥६॥

    मैं, श्रीरूप-सनातनादि उन छः गोस्वामियोंकी वन्दना करता हूँ कि, जो अपने समयको संख्यापूर्वक नाम-जप, नामसंकीर्तन एवं संख्यापूर्वक प्रणाम आदिके द्वारा व्यतीत करते थे; जिन्होंने निद्रा-आहार-विहार आदिपर विजय प्राप्तकरली थी एवं जो अपनेको अत्यन्त दीन मानते थे तथा श्रीराधाकृष्णके गुणोंकी स्मृतिसे प्राप्त माधुर्यमय आनन्दके द्वारा विमुग्ध रहते थे।

    राधाकुण्ड-तटे कलिन्द-तनया-तीरे च वंशीवटे
    प्रेमोन्माद-वशादशेष-दशया ग्रस्तौ प्रमत्तौ सदा ।
    गायन्तौ च कदा हरेर्गुणवरं भावाभिभूतौ मुदा
    वन्दे रूप-सनातनौ रघुयुगौ श्रीजीव-गोपालकौ ॥७॥

    मैं, श्रीरूप-सनातनादि उन छः गोस्वामियोंकी वन्दना करता हूँ कि, जो प्रेमोन्मादके वशीभूत होकर, विरहकी समस्त दशाओंके द्वारा ग्रस्त होकर, प्रमादीकी भाँति, कभी राधाकुण्डके तटपर, कभी युमनाके तटपर एवं कभी वंशीवटपर सदैव घूमते रहते थे; और कभी-कभी श्रीहरिके गुणश्रेष्ठोंको हर्षपूर्वक गाते हुए भावमें विभोर रहते थे।

    हे राधे! व्रजदेविके! च ललिते! हे नन्दसूनो! कुतः
    श्रीगोवर्धन-कल्पपादप-तले कालिन्दिवन्ये कुतः ।
    घोषन्ताविति  सर्वतो  व्रजपुरे  खेदैर्महाविह्वलौ
    वन्दे रूप-सनातनौ रघुयुगौ श्रीजीव-गोपालकौ ॥८॥

    मैं, श्रीरूप-सनातनादि उन छः गोस्वामियोंकी वन्दना करता हूँ कि, जो "हे व्रजकी पूजनीय देवि! राधिके! आप कहाँ हो? हे ललिते! आप कहाँ हो? हे व्रजराजकुमार! आप कहाँ हो? श्रीगोवर्धनके कल्पवृक्षोंके नीचे बैठे हो अथवा कालिन्दीके कमनीय कूलपर विराजमान वन समूहमें भ्रमण कर रहे हो क्या?" इस प्रकार पुकारते हुए विरहजनित पीड़ाओंसे महान विह्वल होकर, व्रजमण्डलमें चारों ओर भ्रमण करते थे।


    श्रीनित्यानन्दाष्टकम्‌

    श्रीवृन्दावनदास ठाकुर

    शरच्चन्द्र-भ्रान्तिं स्फुरदमल-कान्तिं गजगतिं
    हरि-प्रेमोन्मत्तं धृत-परम-सत्त्वं स्मितमुखम् ।
    सदा घूर्णन्नेत्रं कर-कलित-वेत्रं कलिभिदं
    भजे नित्यानन्दं भजन-तरु-कन्दं निरवधि ॥१॥

    मैं, उन श्रीनित्यानन्द प्रभुका निरन्तर भजन करता हूँ, जो श्रीकृष्णभक्तिरूप-वृक्षके मूलस्वरूप हैं, जिनका मुखमण्डल शरत्कालीन चन्द्रमाकी शोभाको तिरस्कृत कर देता है, जिनकी निर्मल कान्ति चारों ओर स्फुरित हो रही है, जिनकी गति मत्त-गजेन्द्रके समान है, जो श्रीकृष्णप्रेममें सदैव उन्मत्त रहते हैं, जो विशुद्ध-सत्त्वमय श्रीविग्रहको धारण करनेवाले हैं, जिनका श्रीमुख मन्दमुस्कानसे युक्त है एवं जिनके नेत्रयुगल श्रीहरिप्रेममें सदा घूमते रहते हैं, जिनके हस्तकमलमें वेत्र शोभा पा रहा है और जो नामसङ्कीर्त्तनके द्वारा कलिकालका भेदन करनेवाले हैं ॥१॥

    रसानामागारं स्वजनगण-सर्वस्वमतुलं
    तदीयैक-प्राणप्रतिम-वसुधा-जाह्नवा-पतिम् ।
    सदा प्रेमोन्मादं परमविदितं मन्द-मनसां
    भजे नित्यानन्दं भजन-तरु-कन्दं निरवधि ॥२॥

    मैं, उन श्रीनित्यानन्द प्रभुका निरन्तर भजन करता हूँ, जो श्रीकृष्णभक्तिरूप-कल्पवृक्षके मूलस्वरूप हैं, जो सभी रसोंके आधार हैं, अपने भक्तजनोंके सर्वस्व हैं एवं अतुलनीय हैं; अपने प्राणोंके समान प्रियतमा वसुधा एवं जाह्नवादेवीके पति हैं, श्रीकृष्णप्रेममें जो सदैव उन्मत्त बने रहते हैं और मन्दबुद्धि व्यक्तियों अर्थात् भक्तिहीन एवं भक्ति-विद्वेषी जनोंके लिए परम अज्ञात हैं ॥२॥

    शचीसूनु-प्रेष्ठं निखिल-जगदिष्टं सुखमयं
    कलौ मज्जज्जीवोद्धरण-करणोद्दाम-करुणम् ।
    हरेराख्यानाद्वा भव-जलधि-गर्वोन्नति-हरं
    भजे नित्यानन्दं भजन-तरु-कन्दं निरवधि ॥३॥

    मैं, उन श्रीनित्यानन्द प्रभुका निरन्तर भजन करता हूँ जो, श्रीकृष्णभक्तिरूप-कल्पवृक्षके मूलस्वरूप हैं, श्रीशचीनन्दनके अतिशय प्रिय हैं, समस्त जगत्‌के इष्ट हैं, सुखस्वरूप हैं, कलियुगमें डूबते हुए जीवोंका उद्धार करनेके लिए अपार करुणासे युक्त हैं और श्रीहरिनाम-सङ्कीर्त्तनके द्वारा संसार-सागरके अहङ्कारकी उन्नतिको हरनेवाले हैं ॥३॥

    अये भ्रातर्नृणां कलि-कलुषिणां किन्नु भविता
    तथा प्रायश्चितं रचय यदनायासत इमे ।
    व्रजन्ति त्वामित्थं सह भगवता मंत्रयति यो
    भजे नित्यानन्दं भजन-तरु-कन्दं निरवधि ॥४॥

    मैं, उन श्रीनित्यानन्द प्रभुका निरन्तर भजन करता हूँ, जो श्रीकृष्णभक्तिरूप-वृक्षके मूलस्वरूप हैं एवं भगवान् श्रीकृष्णचैतन्यदेवके साथ इस प्रकारका विचार करते रहते हैं कि, "हे भैया गौराङ्ग! कलिकालसे कलुषित जीवोंकी क्या गति होगी तथा इनके लिए कौनसा प्रायश्चित होगा? उसकी रचना कीजिए, जिससे ये कलिकालके जीव अनायास ही आपको प्राप्त कर लें" ॥४॥

    यथेष्टं रे भ्रातः! कुरु हरिहरि-ध्वानमनिशं
    ततो वः संसाराम्बुधि-तरण-दायो मयि लगेत् ।
    इदं बाहु-स्फोटैरटति रटयन् यः प्रतिगृहं
    भजे नित्यानन्दं भजन-तरु-कन्दं निरवधि ॥५॥

    मैं, उन श्रीनित्यानन्द प्रभुका निरन्तर भजन करता हूँ जो, श्रीकृष्णभक्तिरूप-कल्पवृक्षके मूलस्वरूप हैं तथा जो गौड़देशमें प्रत्येक घरके द्वारपर जाकर अपनी भुजाओंको उठाकर, "हे भाइयो! तुम सब मिलकर स्वेच्छापूर्वक निरन्तर श्रीहरिनामकी ध्वनि करते रहो, ऐसा करनेसे तुम सबका संसार-सागरसे उद्धार करनेका 'दायित्व' मेरे ऊपर जायेगा" इस प्रकार उच्चारण करते हुए भ्रमण करते रहते हैं ॥५॥

    बलात् संसाराम्भोनिधि-हरण-कुम्भोद्भवमहो
    सतां श्रेयः-सिन्धून्नति-कुमुद-बन्धुं समुदितम् ।
    खलश्रेणी-स्फूर्जत्तिमिर-हर-सूर्य-प्रभमहं
    भजे नित्यानन्दं भजन-तरु-कन्दं निरवधि ॥६॥

    मैं, उन श्रीनित्यानन्द प्रभुका निरन्तर भजन करता हूँ जो, श्रीकृष्णभक्तिरूप-वृक्षके मूलस्वरूप हैं एवं जो बलपूर्वक संसार-सागरको ग्रहण करनेके लिए अगस्त्यस्वरूप हैं तथा सज्जनोंके कल्याणरूप-समुद्रकी उन्नतिके लिए प्रकट पूर्णचन्द्रस्वरूप हैं और खलश्रेणीमें उदित होनेवाले अज्ञानरूपी-अन्धकारको हरनेके लिए सूर्यस्वरूप हैं ॥६॥

    नटन्तं गायन्तं हरिमनुवदन्तं पथि पथि
    व्रजन्तं पश्यन्तं स्वमपि नदयन्तं जनगणम् ।
    प्रकुर्वन्तं सन्तं सकरुण-दृगन्तं प्रकलनाद्
    भजे नित्यानन्दं भजन-तरु-कन्दं निरवधि ॥७॥

    मैं, उन श्रीनित्यानन्द प्रभुका निरन्तर भजन करता हूँ, जो श्रीकृष्णभक्तिरूप-कल्पवृक्षके मूलस्वरूप हैं एवं जो गौड़देशके प्रत्येक मार्गमें नाचते-गाते हुए "हरि बोल", "हरि बोल" की ध्वनि करते हुए भ्रमण करते हैं तथा स्वयंके ऊपर दया न करनेवाले जनसमुदायको भी प्रेमपूर्वक करुणायुक्त कटाक्षसे देखकर, सन्त बनाते रहते हैं ॥७॥

    सुबिभ्राणं भ्रातुः कर-सरसिजं कोमलतरं
    मिथो वक्‍त्रालोकोच्छलित-परमानन्दहृदयम् ।
    भ्रमन्तं माधुर्यैरहह! मदयन्तं पुरजनान्
    भजे नित्यानन्दं भजन-तरु-कन्दं निरवधि ॥८॥

    मैं, उन श्रीनित्यानन्द प्रभुका निरन्तर भजन करता हूँ, जो श्रीकृष्णभक्तिरूप-कल्पवृक्षके मूलस्वरूप हैं तथा जो अपने भैया श्रीगौराङ्गमहाप्रभुके अत्यन्त कोमल करकमलको धारण करनेवाले हैं, तथा परस्पर श्रीमुखके दर्शनसे, जिनके हृदयमें परमानन्द उच्छलित हो रहा है और जो अपने माधुर्यसे पुरवासीजनोंको हर्षित करते हुए भ्रमण करते रहते हैं ॥८॥

    रसानामाधारं रसिक-वर-सद्वैष्णव-धनं
    रसागारं सारं पतित-ततितारं स्मरणतः ।
    परं  नित्यानन्दाष्टकमिदमपूर्वं  पठति य-
    स्तदंघ्रिद्वन्द्वाब्जं स्फुरतु नितरां तस्य हृदये ॥९॥

    श्रीनित्यानन्द प्रभुके इस अपूर्व अष्टकका जो व्यक्ति प्रेमपूर्वक पाठ करता है, उसके हृदयमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके दोनों चरणकमल अत्यन्त स्फूर्ति पाते रहें, यह अष्टककारका आशीर्वाद है; क्योंकि यह श्रीनित्यानन्दाष्टक रसोंका आधार है, रसिकवर-वैष्णवश्रेष्ठजनोंका धनस्वरूप है, भक्तोंके लिए भक्तिरसोंका सारस्वरूप है तथा इसका स्मरण करनेसे पतितोंका उद्धार होता है । इस अष्टकमें 'शिखरिणी' नामक छन्द प्रयुक्त हुआ है ॥९॥


    श्रीशचीतनयाष्टकम्‌

    श्रील सार्वभौम भट्टाचार्य

    उज्ज्वल-वरण-गौरवर-देहं
    विलसित-निरवधि-भावविदेहम् ।
    त्रिभुवन-पावन-कृपायाः लेशं
    तं प्रणमामि च श्रीशचीतनयम् ॥१॥

    उज्ज्वल सुन्‍दरतम गौरवर्ण देहधारी, सदा-सर्वदा वृषभानुनन्दिनी श्रीमती राधिकाके भावसे विभावित होकर विचित्र विलास करनेवाले एवं अपनी कृपाके लेशमात्रसे ही त्रिभुवनको पवित्र करनेवाले शचीनन्दन श्रीगौरहरिको प्रणाम करता हूँ ॥१॥

    गद्गद-अन्तर-भावविकारं
    दुर्जन-तर्जन-नाद-विशालम् ।
    भवभयभञ्जन-कारण-करुणं
    तं प्रणमामि च श्रीशचीतनयम् ॥२॥

    जिनका हृदय नाना प्रकारके भाव-विकारोंसे सर्वदा गद्‍गद रहता है और जिनका विशाल हुँकार (गर्जन ध्वनि) भक्ति-विमुख पाखण्डियोंके लिए भय उत्पादनकारी है और जो संसार-भयका नाश करनेके लिए करुणायुक्त हैं, उन शचीनन्दन श्रीगौरहरिको प्रणाम करता हूँ ॥२॥

    अरुणाम्बरधर-चारुकपोलं
    इन्दु-विनिन्दित-नखचय-रुचिरम् ।
    जल्पित-निजगुणनाम-विनोदं
    तं प्रणमामि च श्रीशचीतनयम् ॥३॥

    जिन्होंने अरुण (गैरिक) वर्णके वस्त्र धारण किये हैं, जिनके कपोल बड़े ही मनोहर हैं, जिनके नख-समूहकी कान्ति-छटा पूर्णचन्द्रकी शोभाको भी पराभूत करती है तथा जो अपने नाम-गुणके कीर्त्तनमें आनन्द प्राप्त करते हैं, उन शचीनन्दन श्रीगौरहरिको प्रणाम करता हूँ ॥३॥

    विगलित-नयन-कमल-जलधारं
    भूषण-नवरस-भावविकारम् ।
    गति-अतिमन्थर-नृत्यविलासं
    तं प्रणमामि च श्रीशचीतनयम् ॥४॥

    जिनके नयनकमलोंसे निरन्तर अश्रुधारा प्रवाहित होती रहती है, नवरस भाव-विकार जिनके श्रीअङ्गोंके भूषण-स्वरूप हैं और नृत्य-विलास हेतु जिनकी गति अति-मन्थर है, उन शचीनन्दन श्रीगौरहरिको प्रणाम करता हूँ ॥४॥

    चञ्चल-चारु-चरण-गति-रुचिरं
    मञ्जीर-रञ्जित-पदयुग-मधुरम् ।
    चन्द्र-विनिन्दित-शीतलवदनं
    तं प्रणमामि च श्रीशचीतनयम् ॥५॥

    जिनके चञ्चल सुन्दर चरण-कमलोंकी गति अतिशय मनोहर है, नूपुरोंसे सुशोभित जिनके चरणयुगल अत्यन्त मधुर हैं, जिनका सुशीतल वदन चन्द्रकी कान्तिको विनिन्दित करनेवाला है, उन शचीनन्दन श्रीगौरहरिको प्रणाम करता हूँ ॥५॥

    धृत-कटि-डोर-कमण्डलु-दण्डं
    दिव्य-कलेवर-मुण्डित-मुण्डम् ।
    दुर्जन-कल्मष-खण्डन-दण्डं
    तं प्रणमामि च श्रीशचीतनयम् ॥६॥

    जिन्होंने कमरमें डोर-बहिर्वास एवं हाथमें दण्ड-कमण्डलु धारण कर रखा है, मुण्डन किया हुआ अति भव्य जिनका मस्तक है, जो अतिशय दिव्य कलेवर विशिष्ट हैं, जिनका दण्ड दुर्जनोंके पाप-समूहका नाश करनेवाला है, उन शचीनन्दन श्रीगौरहरिको प्रणाम करता हूँ ॥६॥

    भूषण-भूरज-अलका-वलितं
    कम्पित-बिम्बाधरवर-रुचिरम् ।
    मलयज-विरचित-उज्ज्वल-तिलकं
    तं प्रणमामि च श्रीशचीतनयम् ॥७॥

    जिनकी अलकावलि धूलिरूप भूषणसे युक्त है, जिनका (हरिनाम कीर्त्तन हेतु) काँपता हुआ बिम्ब सदृश अरुण-अधर बड़ा ही मनोहर है, मलयज चन्दन द्वारा विरचित उज्ज्वल तिलकसे सुशोभित उन शचीनन्दन श्रीगौरहरिको प्रणाम करता हूँ ॥७॥

    निन्दित-अरुण-कमल-दल-नयनं
    आजानुलम्बित-श्रीभुज-युगलम् ।
    कलेवर-कैशोर-नर्तक-वेशं
    तं प्रणमामि च श्रीशचीतनयम् ॥८॥

    जिनके अरुण-नयन कमलदलकी शोभाको तिरस्कार करनेवाले हैं, जिनकी दो भव्य भुजायें घुटनोंतक लम्बी हैं, उन नृत्य-वेशयुक्त कलेवरवाले शचीनन्दन श्रीगौरहरिको प्रणाम करता हूँ ॥८॥


    श्रीकृष्णचन्द्राष्टकम्

    श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी

    अम्बुदाञ्जनेन्द्रनील-निन्दि-कान्ति-डम्बरः
    कुङ्कुमोद्यदर्क-विद्युदंशु-दिव्यदम्बरः।
    श्रीमदङ्ग-चर्चितेन्दु-पीतनाक्त-चन्दनः
    स्वांघ्रिदास्यदोऽस्तु मे स बल्लवेन्द्र-नन्दनः ॥१॥

    गोपराजकुमार वे श्रीकृष्ण, मुझे अपने श्रीचरणकमलोंकी सेवा प्रदान करें, जिनकी कान्तिकी छटा नूतन-जलधर, अञ्जन एवं इन्द्रनीलमणिका भी तिरस्कार करनेवाली है एवं जिनका पीताम्बर कुङ्कुम, उदय होनेवाले सूर्यकी किरणों तथा विद्युतसे भी अधिक शोभायमान है; और जिनके श्रीअङ्ग कपूर, केसर एवं चन्दनसे चर्चित हैं ॥१॥

    गण्ड-ताण्डवाति-पण्डिताण्डजेश-कुण्डल -
    श्चन्द्र-पद्मषण्ड-गर्व-खण्डनास्यमण्डलः ।
    बल्लवीषु वर्धितात्म-गूढ़भाव-बन्धनः
    स्वांघ्रिदास्यदोऽस्तु मे स बल्लवेन्द्र-नन्दनः ॥२॥

    गोपराजकुमार वे श्रीकृष्ण, मुझे अपने श्रीचरणकमलोंकी सेवा प्रदान करें, जिनके दोनों कपोलोंपर नृत्य करनेमें परमकुशल, मकराकृत कुण्डल विराजमान हैं एवं जिनका मुखमण्डल चन्द्रमा तथा कमलसमूहोंके गर्वका खण्डन करनेवाला है और जो ब्रजगोपियोंपर अपने गूढ़भावके (प्रेम) बन्धनको बढ़ाते रहते हैं ॥२॥

    नित्यनव्य-रूपवेशहार्द-केलिचेष्टितः
    केलिनर्म-शर्मदायि-मित्रवृन्द-वेष्टितः ।
    स्वीय-केलि-काननांशु-निर्जितेन्द्र-नन्दनः
    स्वांघ्रिदास्यदोऽस्तु मे स बल्लवेन्द्र-नन्दनः ॥३॥

    गोपराजकुमार वे श्रीकृष्ण, मुझे अपने श्रीचरणकमलोंकी सेवा प्रदान करें, जिनका रूप, वेषभूषा और प्रेमभरी चेष्टाएँ— ये सभी नित्य नवीन हैं एवं जो खेलके समय परिहासमय वचनोंसे सुख देनेवाले मित्रमण्डलसे परिवेष्टित हैं और जो अपने क्रीड़ा-कानन श्रीधाम वृन्दावनकी किरणोंके द्वारा इन्द्रके नन्दनवनको पराजित करते रहते हैं ॥३॥

    प्रेमहेम-मण्डितात्म-बन्धुताभिनन्दितः
    क्षौणिलग्न-भाल-लोकपाल-पालि-वन्दितः ।
    नित्यकालसृष्ट-विप्र-गौरवालि-वन्दनः
    स्वांघ्रिदास्यदोऽस्तु मे स बल्लवेन्द्र-नन्दनः ॥४॥

    गोपराजकुमार वे श्रीकृष्ण, मुझे अपने श्रीचरणकमलोंकी सेवा प्रदान करें, जो प्रेमरूप-सुवर्णके द्वारा विभूषित अपने बन्धुवर्गसे सदैव आनन्दित रहते हैं अथवा पूर्वोक्त गुणविशिष्ट बन्धुजन जिनका अभिनन्दन करते हैं एवं ऐसे इन्द्र आदि लोकपालोंके समूह भूमिमें मस्तक लगाकर जिनकी वन्दना करते हैं और जो अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक होकर भी प्रतिदिन प्रातःकाल आदि यथोचित समयमें, ब्राह्मण एवं गुरुजनोंकी वन्दना करते रहते हैं ॥४॥

    लीलयेन्द्र-कालियोष्ण-कंस-वत्स-घातक-
    स्तत्तदात्म-केलि-वृष्टि-पुष्ट-भक्तचातकः ।
    वीर्यशील-लीलयात्म-घोषवासि-नन्दनः
    स्वांघ्रिदास्यदोऽस्तु मे स बल्लवेन्द्र-नन्दनः ॥५॥

    गोपराजकुमार वे श्रीकृष्ण, मुझे अपने श्रीचरणकमलोंकी सेवा प्रदान करें, जो इन्द्र एवं कालियनागकी उष्णताको अनायास ही शान्त करनेवाले हैं तथा कंस एवं वत्सासुरका अनायास ही वध करनेवाले हैं तथा इन्द्रादिके गर्वखण्डन आदि अपनी क्रीड़ारूप वर्षाके द्वारा जो भक्तरूप-चातकोंको पुष्ट करनेवाले हैं और जो अपने पराक्रम, विशुद्ध स्वभाव तथा विशुद्ध लीला आदिके द्वारा अपने ब्रजवासियोंको आनन्दित करनेवाले हैं ॥५॥

    कुञ्ज-रासकेलि-सीधु-राधिकादि-तोषण -
    स्तत्तदात्म-केलि-नर्म-तत्तदालि-पोषणः ।
    प्रेम-शील-केलि-कीर्त्ति-विश्वचित्त-नन्दनः
    स्वांघ्रिदास्यदोऽस्तु मे स बल्लवेन्द्र-नन्दनः ॥६॥

    गोपराजकुमार वे श्रीकृष्ण, मुझे अपने श्रीचरणकमलोंकी सेवा प्रदान करें, जो अपनी निकुञ्जलीला एवं रासलीलारूप-सुधाके द्वारा, श्रीमती राधिकादि गोपियोंको सन्तुष्ट करनेवाले हैं, जो निकुञ्जलीला एवं रासलीला आदिरूप अपनी क्रीड़ाओंमें होनेवाले हास-परिहासके द्वारा श्रीमती राधिकादि सखियोंका पोषण करनेवाले हैं और जो अपने लोकोत्तर प्रेम-स्वभाव-क्रीड़ा-कीर्त्ति आदिके द्वारा समस्त विश्वके चित्तको आनन्दित करनेवाले हैं ॥६॥

    रासकेलि-दर्शितात्म-शुद्धभक्ति-सत्पथः
    स्वीय-चित्र-रूपवेश-मन्मथालि-मन्मथः ।
    गोपिकासु नेत्रकोण-भाववृन्द-गन्धनः
    स्वांघ्रिदास्यदोऽस्तु मे स बल्लवेन्द्र-नन्दनः ॥७॥

    गोपराजकुमार वे श्रीकृष्ण, मुझे अपने श्रीचरणकमलोंकी सेवा प्रदान करें, जो कामगन्धशून्य रासलीलाके द्वारा अपनी विशुद्धभक्तिके सन्मार्गको दिखानेवाले हैं एवं अपने विचित्र रूप तथा वेशके द्वारा कामदेवके भी मनका मन्थन करनेवाले हैं और जो व्रजगोपियोंके प्रति  अपने नेत्रके कोनेसे ही भावसमूहकी सूचना करनेवाले हैं ॥७॥

    पुष्पचायि-राधिकाभिमर्ष-लब्धि-तर्षितः
    प्रेमवाम्य-रम्य-राधिकास्य-दृष्टि-हर्षितः ।
    राधिकोरसीह लेप एष हरिचन्दनः
    स्वांघ्रिदास्यदोऽस्तु मे स बल्लवेन्द्र-नन्दनः ॥८॥

    गोपराजकुमार वे श्रीकृष्ण, मुझे अपने श्रीचरणकमलोंकी सेवा प्रदान करें, जो पुष्पोंका चयन करनेवाली श्रीमती राधिकाके स्पर्शकी प्राप्तिके विषयमें सदैव तृष्णासे युक्त रहते हैं एवं प्रेममयी कुटिलतासे रमणीय श्रीमती राधिकाके श्रीमुखके दर्शनसे जो हर्षित रहते हैं और जो इस व्रजमें श्रीमती राधिकाके वक्षःस्थलपर हरि-वर्ण चन्दनके लेपस्वरूप हैं ॥८॥

    अष्टकेन यस्त्वनेन राधिकासुवल्लभं
    संस्तवीति दर्शनेऽपि सिन्धुजादि-दुर्लभम् ।
    तं युनक्ति तुष्टचित्त एष घोषकानने
    राधिकाङ्ग-सङ्ग-नन्दितात्म-पादसेवने ॥९॥

    जो व्यक्ति लक्ष्मी आदिके लिए भी दुर्लभ दर्शनवाले, श्रीमती राधिकाके प्राण-प्रियतम  श्रीकृष्णकी स्तुति इस अष्टकके द्वारा करते हैं, श्रीमती राधिकाके अङ्ग-सङ्गसे आनन्दित एवं प्रसन्नचित्त श्रीकृष्ण, उसे श्रीधाम वृन्दावनमें अपने श्रीचरणोंकी सेवामें नियुक्त कर लेते हैं । इस अष्टकमें 'तूणक'—नामक छन्द है ॥९॥

    श्रीराधिकाष्टकम् (३)

    श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी

    कुङ्कुमाक्त-काञ्चनाब्ज-गर्वहारि-गौरभा
    पीतनाञ्चिताब्ज-गन्धकीर्ति-निन्दि-सौरभा ।
    बल्लवेश-सूनु-सर्व-वाञ्छितार्थ-साधिका
    मह्यमात्म-पादपद्म-दास्यदास्तु राधिका ॥१॥

    वे श्रीमती राधिका, मुझे अपने पादपद्मोंकी सेवा प्रदान करती रहें, जिनके श्रीविग्रहकी कान्ति, कुङ्कुमसे अभिषिक्त सुवर्णकमलके गर्वका हरण करनेवाली है एवं जिनके श्रीअङ्गकी सुगन्ध केसरसे सुशोभित कमलकी सुगन्धको भी विनिन्‍दित करनेवाली है तथा जो गोपराजकुमार श्रीकृष्णके अभिलषित सभी प्रयोजनोंको सिद्ध करनेवाली हैं ॥१॥

    कौरविन्द-कान्ति-निन्दि-चित्र-पट्ट-शाटिका
    कृष्ण-मत्तभृङ्ग-केलि-फुल्ल-पुष्प-वाटिका ।
    कृष्ण-नित्य-सङ्गमार्थ-पद्मबन्धु-राधिका
    मह्यमात्म-पादपद्म-दास्यदास्तु राधिका ॥२॥

    वे श्रीमती राधिका, मुझे अपने पादपद्मोंकी सेवा प्रदान करती रहें, जिनकी विचित्र रङ्गोवाली रेशमी साड़ी मूंगेकी शोभाको निन्‍दित करनेवाली है एवं जो श्रीकृष्णरूप-मत्तभ्रमरकी क्रीड़ाके लिए, प्रफुल्लित पुष्पवाटिका-स्वरूप हैं तथा श्रीकृष्णके साथ नित्य मिलनके लिए, जो सूर्यकी आराधना करती रहती हैं ॥२॥

    सौकुमार्य-सृष्ट-पल्लवालि-कीर्ति-निग्रहा
    चन्द्र-चन्दनोत्पलेन्दु-सेव्य-शीत-विग्रहा ।
    स्वाभिमर्ष-बल्लवीश-काम-ताप-बाधिका
    मह्यमात्म-पादपद्म-दास्यदास्तु राधिका ॥३॥

    वे श्रीमती राधिका, मुझे अपने पादपद्मोंकी सेवा प्रदान करती रहें, जो अपनी सुकुमारताके द्वारा, नवपल्लवश्रेणीके यशका तिरस्कार सृष्ट करती हैं एवं जिनका शीतल श्रीविग्रह चन्द्र-चन्दन-कमल एवं कर्पूर आदि परमशीतल पदार्थोंके द्वारा सेवा करने योग्य है अर्थात् उन सबसे भी अधिक शीतल है, तथा जो अपने स्पर्शमात्रसे, गोपीजनवल्लभ श्रीकृष्णके कन्दर्पजनित तापको दूर करनेवाली हैं ॥३॥

    विश्ववन्द्य-यौवताभिवन्दितापि या रमा
    रूप-नव्य-यौवनादि-सम्पदा न यत्समा ।
    शील-हार्द-लीलया च सा यतोऽस्ति नाधिका
    मह्यमात्म-पादपद्म-दास्यदास्तु राधिका ॥४॥

    वे श्रीमती राधिका, मेरे लिए अपने पादपद्मोंकी सेवा प्रदान करती रहें कि, जो लक्ष्मीदेवी, विश्ववन्दनीय युवतियोंके द्वारा अभिवन्दित होकर भी, अपने रूप एवं नवीन यौवन आदि सम्पत्तिके द्वारा, जिनके समान नहीं हैं एवं वही लक्ष्मीदेवी, अपने स्वभावप्रेम तथा क्रीड़ा आदिके द्वारा भी, जिनसे अधिक नहीं हैं ॥४॥

    रास-लास्य-गीत-नर्म-सत्कलालि-पण्डिता
    प्रेम-रम्य-रूप-वेश-सद्गुणालि-मण्डिता ।
    विश्व-नव्य-गोप-योषिदालितोऽपि याधिका
    मह्यमात्म-पादपद्म-दास्यदास्तु राधिका ॥५॥

    वे श्रीमती राधिका, मुझे अपने पादपद्मोंकी सेवा प्रदान करती रहें कि, जो रासलीलामें नृत्य-गीत-परिहास आदि सुन्दर कलाश्रेणीमें पण्डित हैं एवं लोकोत्तर-प्रेम, रमणीय रूप, वेषभूषा एवं श्रेष्ठ गुणावलीसे जो विभूषित हैं तथा जो समस्त नवीन गोपाङ्गनाश्रेणीसे भी श्रेष्ठ हैं ॥५॥

    नित्य-नव्य-रूप-केलि-कृष्णभाव-सम्पदा
    कृष्णराग-बन्ध-गोप-यौवतेषुकम्पदा ।
    कृष्ण-रूप-वेश-केलि-लग्न-सत्समाधिका
    मह्यमात्म-पादपद्म-दास्यदास्तु राधिका ॥६॥

    वे श्रीमती राधिका, मुझे अपने पादपद्मोंकी सेवा प्रदान करती रहें, जो अपने नित्य नवीन रूप एवं नित्य नवीन अपनी क्रीड़ा तथा नित्य नवीन अपनी कृष्णभावरूपी-सम्पत्तिके द्वारा, श्रीकृष्णके अनुरागमें बँधी हुई हैं तथा गोप-युवतियोंकी श्रेणियोंको भी कम्पित करनेवाली हैं एवं श्रीकृष्णके रूप-वेश-क्रीड़ा आदिके अनुभवमें, जिनकी सुन्दर समाधि लग जाती है ॥६॥

    स्वेद-कम्प-कण्टकाश्रु-गद्गदादि-सञ्चिता-
    मर्ष-हर्ष-वामतादि-भाव-भूषणाञ्चिता ।
    कृष्ण-नेत्र-तोषि-रत्न-मण्डनालि-दाधिका
    मह्यमात्म-पादपद्म-दास्यदास्तु राधिका ॥७॥

    वे श्रीमती राधिका, मुझे अपने पादपद्मोंकी सेवा प्रदान करती रहें कि, जो स्वेद-कम्प-पुलक-अश्रु एवं गद्गद आदि सात्त्विक भावोंसे संयुक्त हैं एवं प्रणयकोप, हर्ष तथा प्रेममयी कुटिलता आदि भावरूपी भूषणोंसे जो विभूषित हैं; तथा जो श्रीकृष्णके नेत्रोंको सन्तुष्ट करनेवाली रत्नजटित भूषणोंकी श्रेणीको धारण करनेवाली हैं ॥७॥

    या क्षणार्ध-कृष्ण-विप्रयोग-सन्ततोदिता-
    नेक-दैन्य-चापलादि-भाववृन्द-मोदिता ।
    यत्नलब्ध-कृष्णसङ्ग-निर्गताखिलाधिका
    मह्यमात्म-पादपद्म-दास्यदास्तु राधिका ॥८॥

    वे श्रीमती राधिका, मुझे अपने पादपद्मोंकी सेवा प्रदान करती रहें कि, जो श्रीकृष्णके आधे क्षणके वियोगसे भी, निरन्तर उदय होनेवाली दीनता-चञ्चलता आदि अनेक भावोंसे व्यथित हो जाती हैं एवं जो उस समय अपने अथवा श्रीकृष्णके दूतीप्रेरण आदि कार्यके द्वारा श्रीकृष्ण सङ्ग प्राप्त करके समस्त मानसिक व्यथाओंसे रहित हो जाती हैं ॥८ ॥

    अष्टकेन यस्त्वनेन नौति कृष्णवल्लभां
    दर्शनेऽपि शैलजादि-योषिदालि-दुर्लभाम् ।
    कृष्णसङ्ग-नन्दितात्म-दास्य-सीधु-भाजनं
    तं करोति नन्दितालि-सञ्चयाशु सा जनम् ॥९॥